भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

सूत्र ३४ ] अध्याय १ १०१ 'देवा वै सत्रमासत्।' (तै० सं० २।३।३) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की कि मैं उत्पन्न होऊँ, भलीभाँति जन्म ग्रहण करूँ, उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओंने यज्ञका अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओंका कर्माधिकार सूचित होता है। इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें देवताओंका अधिकार बतानेवाले वचन ये हैं—'तद् यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्।' (बृह० उ० १।४।१०) अर्थात् 'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह—ब्रह्म हो गया' इत्यादि। इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्में (८।७।२ से ८।१२।६ तक) यह प्रसंग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामें रहकर बहुत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका वेदविद्यामें अधिकार है? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १। ३ । ३४ ॥ तदनादरश्रवणात्=उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर, अस्य=इस राजा जानश्रुतिके मनमें, शुक्=शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर; आद्रवणात्=(जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था) उन रैक्वमुनिके पास वह विद्याप्राप्तिके लिये दौड़ा गया; (इस कारण उन रैक्वने उसे शूद्र कहकर पुकारा) हि=क्योंकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता) सूचित होती है। व्याख्या—इस प्रकरणमें रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर सम्बोधित किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपितु