वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १५ ] अध्याय १ १२५ पदसे उसी पूर्वानुवाकमें वर्णित ब्रह्मका आकर्षण किया गया है। तत्पश्चात् अन्तमें कहा गया है कि यह जो कुछ है, वह सत्य ही है—सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है।' उसके बाद इसी विषयमें प्रमाणरूपमें श्लोक कहनेकी प्रतिज्ञा करके सातवें अनुवाकमें, 'असद् वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि मन्त्र प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार पूर्वापर-प्रसंगको देखते हुए इस मन्त्रमें आया हुआ 'असत्' शब्द मिथ्या या अभावका वाचक सिद्ध नहीं होता; अतः वहाँ 'असत्' का अर्थ 'अप्रकट ब्रह्म' और उससे होनेवाले 'सत्' का अर्थ जगत्-रूपमें 'प्रकट ब्रह्म' ही होगा। इसलिये यहाँ अर्थान्तरकी कल्पना अनावश्यक है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में भी जो यह कहा गया है कि 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत्।' (छा० उ० ३।१९।१) अर्थात् 'आदित्य ब्रह्म है, यह उपदेश है, उसीका यह विस्तार है। पहले यह असत् ही था' इत्यादि। यहाँ भी तैत्तिरीयोपनिषद्की भाँति 'असत्' शब्द 'अप्रकट ब्रह्म' का ही वाचक है; क्योंकि इसी मन्त्रके अगले वाक्यमें 'तत्सदासीत्' कहकर उसका 'सत्' नामसे भी वर्णन आया है। इसके सिवा 'बृहदारण्यकोपनिषद्में स्पष्ट ही 'असत्' के स्थानमें 'अव्याकृत' शब्दका प्रयोग किया गया है। (बृह० उ० १।४।७) जो कि 'अप्रकट' का ही पर्याय है। अतः सब जगह पूर्वापरके प्रसंगमें कहे हुए शब्दों या वाक्योंका आकर्षण करके अन्वय करनेपर यही निश्चय होता है कि जगत्के कारणरूपसे भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा उस पूर्णब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। प्रकृति या प्रधानकी सार्थकता परमात्माकी एक शक्ति माननेसे ही हो सकती है; उनसे भिन्न स्वतन्त्र पदार्थान्तर माननेसे नहीं। सम्बन्ध—ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं हो सकती। यह दृढ़ करनेके लिये सूत्रकार कौषीतकि-उपनिषद्के प्रसंगपर विचार करते हुए कहते हैं—