भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १८ ] अध्याय १ १२७ (प्राणसहित जीव ही ज्ञेय तत्त्व होना चाहिये); न=ब्रह्म वहाँ ज्ञेय नहीं है; (तो) तद् व्याख्यातम्=इसका निराकरण पहले किया जा चुका है। व्याख्या—यदि यह कहो कि 'यहाँ वाक्यशेषमें जीव और मुख्य प्राणके सूचक लक्षणोंका स्पष्टरूपसे वर्णन है, इसलिये प्राणोंके सहित उसका अधिष्ठाता जीव ही जगत्का कर्ता एवं ज्ञेय बताया गया है, ब्रह्म नहीं।' तो यह उचित नहीं है; क्योंकि इस शंकाका निवारण पहले (१।१।३१ सूत्रमें) कर दिया गया है। वहाँ यह बता दिया गया है कि ब्रह्म सभी धर्मोंका आश्रय है, अतः जीव तथा प्राणके धर्मोंका उसमें बताया जाना अनुचित नहीं है। यदि जीव आदिको भी ज्ञेय तत्त्व मान लें तो त्रिविध उपासनाका प्रसंग उपस्थित हो सकता है, जो उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब सूत्रकार इस विषयमें आचार्य जैमिनिकी सम्मति क्या है, यह बताते हैं— अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके ॥ १ । ४ । १८ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि; तु = तो (कहते हैं कि); अन्यार्थम् = (इस प्रकरणमें) जीवात्मा तथा मुख्य प्राणका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे है; प्रश्नव्याख्यानाभ्याम्=क्योंकि प्रश्न और उत्तरसे यही सिद्ध होता है; च = तथा; एके = एक (काण्व) शाखावाले; एवम् अपि = ऐसा कहते भी हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनि पूर्व कथनका निराकरण करते हुए कहते हैं कि इस प्रकरणमें जो जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन आया है, वह मुख्य प्राण या जीवात्माको जगत्का कारण बतानेके लिये नहीं आया है, जिससे कि ब्रह्मको समस्त लक्षणोंका आश्रय बताकर उत्तर देनेकी आवश्यकता पड़े। यहाँ तो उनका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे आया है। अर्थात् उनका ब्रह्ममें विलीन होना बताकर ब्रह्मको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये उनका वर्णन है। भाव यह है कि जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थाके वर्णनद्वारा सुषुप्तिके