भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 486 में से

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सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ १२९ यही सिद्ध होता है कि बीचमें आया हुआ जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन भी उस परब्रह्म परमात्माको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये है। सम्बन्ध - इसी विषयमें आश्मरथ्य आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— प्रतिज्ञासिद्धेर्लिंगमित्याश्मरथ्यः ॥ १ । ४ । २० ॥ लिंगम् = उक्त प्रकरणमें जीवात्मा और मुख्य प्राणके लक्षणोंका वर्णन, ब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये हुआ है; प्रतिज्ञासिद्धेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पहले की हुई प्रतिज्ञाकी सिद्धि होती है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या - आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि अजातशत्रुने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' — 'तुझे ब्रह्मका स्वरूप बताऊँगा।' उसकी सिद्धि परब्रह्मको ही जगत्का कारण माननेसे हो सकती है, इसलिये उस प्रसंगमें जो जीवात्मा तथा मुख्य प्राणके लक्षणोंका वर्णन आया है, वह इसी बातको सिद्ध करनेके लिये है कि जगत्का कारण परब्रह्म परमात्मा ही है। सम्बन्ध - अब इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत दिया जाता है— उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमिः ॥ १ । ४ । २१ ॥ उत्क्रमिष्यतः = शरीर छोड़कर परलोकमें जानेवाले ब्रह्मज्ञानीका; एवं भावात् = इस प्रकार ब्रह्ममें विलीन होना (दूसरी श्रुतिमें भी बताया गया) है, इसलिये; (यहाँ जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन परब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये है;) इति = ऐसा; औडुलोमिः = औडुलोमि आचार्य मानते हैं। व्याख्या - जिस प्रकार इस प्रकरणमें सोते हुए मनुष्यके समस्त प्राणोंसहित जीवात्माका परमात्मामें विलीन होना बताया गया है, इसी प्रकार शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमें जानेवाले ब्रह्मज्ञानीकी गतिका वर्णन करते हुए मुण्डकोपनिषद्में कहा गया है कि—