भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 164

सूत्र २९-३० ] अध्याय २ १६१ सम्बन्ध-इतना ही नहीं, निरवयव वस्तुसे विचित्र सावयव जगत्की सृष्टि सांख्यवादी स्वयं भी मानते हैं। अतः— स्वपक्षदोषाच्च ॥ २।१। २९ ॥ स्वपक्षदोषात् = उनके अपने पक्षमें ही उक्त दोष आता है, इसलिये; च=भी (परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का कारण मानना ठीक है)। व्याख्या-यदि सांख्यमतके अनुसार प्रधानको जगत्का कारण मान लिया जाय तो उसमें भी अनेक दोष आवेंगे; क्योंकि वह वेदसे तो प्रमाणित है ही नहीं; युक्तिसे भी, उस अवयवरहित जड प्रधानसे इस अवयवयुक्त सजीव जगत्की उत्पत्ति माननेमें विरोध आता है; क्योंकि सांख्यवादी भी प्रधानको न तो सीमित मानते हैं, न सावयव । अतः उनके मतमें भी प्रधानका जगत्-रूपमें परिणत होना स्वीकार करनेपर पूर्वकथित सभी दोष प्राप्त होते हैं। अतः यही ठीक है कि परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। सम्बन्ध - सांख्यादि मतोंकी मान्यतामें दोष दिखाकर अब पुनः अपने सिद्धान्तको निर्दोष सिद्ध करते हुए कहते हैं- सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥ २।१।३० ॥ च= इसके सिवा, वह परा देवता (परब्रह्म परमेश्वर); सर्वोपेता = सब शक्तियोंसे सम्पन्न है; तद्दर्शनात् = क्योंकि श्रुतिके वर्णनमें ऐसा ही देखा जाता है। शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः । भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता ॥ (वि० पु० १।३।२-३) पराशर मुनि उत्तर देते हैं— 'तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय! समस्त भावपदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञानकी विषय हैं, (साधारण मनुष्य उनको नहीं समझ सकता) अग्निकी उष्णता-शक्तिकी भाँति ब्रह्मकी भी सर्गादिरचनारूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं।'

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 164, कुल 486 में से · BharatKosha