भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 486 में से

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उनको कर्मानुसार अच्छी-बुरी (सुखी-दुःखी) योनियोंमें उत्पन्न करते हैं। इसलिये अच्छे न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले परमात्मापर विषमता और निर्दयताका दोष नहीं लगाया जा सकता है। स्मृतियोंमें भी जगह-जगह कहा गया है कि जीवको अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे- 'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४।१६) अर्थात् 'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार भगवान्ने अशुभ कर्ममें रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोंको आसुरी योनिमें डालनेकी बात बतायी है। * इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमें उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध होता है; अतः उन्हें जगत्का कारण मानना ठीक ही है। सम्बन्ध - पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं- न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २।१।३५ ॥ चेत् = यदि कहो; कर्माविभागात् = जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और उनके कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी अपेक्षासे सृष्टि करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न= तो ऐसी बात नहीं है; अनादित्वात् = क्योंकि जीव और उनके कर्म अनादि हैं।

  • अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ (गीता १६। १८-१९) 'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर, अशुभ- कर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमें आसुरी योनियोंमें ही डालता हूँ।'