भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र ३७ ] अध्याय २ १६९ सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ २ । १ । ३७ ॥ सर्वधर्मोपपत्तेः = (इस जगत्कारण परब्रह्ममें) सब धर्मोंकी संगति है, इसलिये; च = भी (किसी प्रकारका विरोध नहीं है)। व्याख्या—इस जगत्कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें सभी धर्मोंका होना संगत है; क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बननेमें समर्थ है। इसीलिये वह सगुण भी है और निर्गुण भी। समस्त जगद्व्यापारसे रहित होकर भी सब कुछ करनेवाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। उस सर्वधर्माश्रय परब्रह्म परमेश्वरके लिये कुछ भी दुष्कर या असम्भव नहीं है। इस प्रकार विवेचन करनेसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मको जगत्‌का कारण माननेमें कोई भी दोष या विरोध नहीं है। इस पादमें आचार्य बादरायणने प्रधानतः अपने पक्षमें आनेवाले दोषोंका निराकरण करते हुए अन्तमें जीव और उनके कर्मोंको अनादि बतलाकर इस जगत्‌की अनादि-सत्ता तथा सत्कार्यवादकी सिद्धि की है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ग्रन्थकार परमेश्वरको केवल निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही नहीं मानते; किंतु सर्वज्ञता आदि सब धर्मोंसे सम्पन्न भी मानते हैं। पहला पाद सम्पूर्ण