भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १६ ] अध्याय २ १८३ नित्य हैं, इस प्रतिज्ञाकी सिद्धि नहीं होती। इस प्रकार अनुपपत्तियोंसे भरा हुआ यह परमाणुवाद कदापि सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं— उभयथा च दोषात्॥ २। २। १६॥ उभयथा=परमाणुओंको न्यूनाधिक गुणोंसे युक्त मानें या गुणरहित मानें, दोनों प्रकारसे; च=ही; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता।) व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोंमेंसे किसीमें अधिक और किसीमें कम गुण देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओंमें भी न्यूनाधिक गुणोंकी स्थिति माननी होगी। ऐसी दशामें यदि उनको अधिक गुणोंसे युक्त माना जाय तब तो सभी कार्योंमें उतने ही गुण होने चाहिये; क्योंकि कारणके गुण कार्यमें समानजातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं। उस दशामें जलमें भी गन्ध और तेजमें भी गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा। अधिक गुणवाली पृथिवीमें स्थूलता नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमें मानना पड़ेगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही हैं तब तो सभी स्थूल भूतोंमें एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये। उस अवस्थामें तेजमें स्पर्श नहीं होगा, जलमें रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा पृथिवीमें रस, रूप एवं स्पर्शका अभाव होगा; क्योंकि उनके परमाणुओंमें एकसे अधिक गुणका अभाव है। यदि उनमें सर्वथा गुणोंका अभाव मान लें तो उनके कार्योंमें जो गुण प्रकट होते हैं, वे उन कारणोंके विपरीत होंगे। यदि कहें कि विभिन्न भूतोंके अनुसार उनके कारणोंमें कहीं अधिक, कहीं कम गुण स्वीकार करनेसे दोष नहीं आवेगा; तो ठीक नहीं है; क्योंकि जिन परमाणुओंमें अधिक गुण माने जायँगे, उनकी परमाणुता ही नहीं रह जायगी; अतः परमाणुवाद किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता है। सम्बन्ध—अब परमाणुवादको अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—