भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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( १६ ) सूत्र विषय पृष्ठ जीवको स्वप्नमें नियुक्त करते हैं, जीवमें ईश्वरसदृश गुण तिरोहित हैं, परमात्माके ध्यानसे प्रकट होते हैं, उसके अनादि बन्धन और मोक्ष भी परमात्माके सकाशसे हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोभाव देहके सम्बन्धसे है ...... २८२-२८६ ७-१० सुषुप्तिकालमें जीवकी नाड़ियोंके मूलभूत हृदयमें स्थिति, उस समय उसे परमात्मामें स्थित बतानेका रहस्य, सुषुप्तिसे पुन: उसी जीवके जाग्रत् होनेका कथन तथा मूर्च्छाकालमें अधूरी सुसुप्तावस्थाका प्रतिपादन ......... २८६-२९० ११-२६ सर्वान्तर्यामी परमात्माका किसी भी स्थान-दोषसे लिप्त न होना, परमेश्वरका निर्गुण-निर्विशेष, सगुण-सविशेष दोनों लक्षणोंसे युक्त होना, इसमें सम्भावित विरोधक परिहार उक्त दोनों लक्षणोंकी मुख्यता, परमात्मामें भेदका अभाव, सगुणरूपकी औपाधिकताका निराकरण, प्रतिबिम्बके दृष्टान्तका रहस्य, परमेश्वरमें शरीरके वृद्धि-ह्रास आदि दोषोंका अभाव, निषेध श्रुतियोंद्वार इयत्तामात्रका प्रतिषेध, निर्गुण- सगुण दोनों स्वरूपोंका मन-बुद्धिसे अतीत होना तथा आराधनासे भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन होनेका कथन .................. २९१-३०४ २७-३३ परमात्माका अपनी शक्तियोंसे अभेद और भेद तथा अभेदोपासना और भेदोपासनाके उपदेशका अभिप्राय .... ३०४-३१० ३४-३७ शरीर आदिके सम्बन्धसे जीवोंके परस्पर भेदकी सिद्धि, प्रकृतियोंमें भेद होनेपर भी परब्रह्ममें भेद या नानात्वका अभाव.. ३११-३१३ ३८-४१ कर्मोंका फल देनेवाला परमात्मा ही है, कर्म नहीं; इसका प्रतिपादन ................................................ ३१३-३१५ तीसरा पाद १-१० वेदान्तवर्णित समस्त ब्रह्मविद्याओंकी एकता, भेद- प्रतीतिका निराकरण, शाखा-विक्षेपके लिये ही शिरोव्रत आदिका नियम, समानविद्याके प्रकरणमें एक जगह