वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ रहनेसे दोनोंकी परम्परा निरन्तर चलती ही रहेगी। इसके रुकनेका कोई भी कारण उनकी मान्यताके अनुसार नहीं है। इसीलिये किसी प्रकारके निरोधकी सिद्धि नहीं होगी। सम्बन्ध— बौद्धमतवाले ऐसा मानते हैं कि सब पदार्थ क्षणिक और असत्य होते हुए भी भ्रान्तिरूप अविद्याके कारण स्थिर और सत्य प्रतीत होते हैं। ज्ञानके द्वारा अविद्याका अभाव होनेसे सबका अभाव हो जाता है। इस प्रकार बुद्धिपूर्वक निरोधकी सिद्धि होती है। इसका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— उभयथा च दोषात्॥ २। २। २३॥ उभयथा=दोनों प्रकारसे; च=भी; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (उनकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है)। व्याख्या—यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिरूप अविद्यासे प्रतीत होनेवाला यह जगत् पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश होनेपर उसीके साथ नष्ट हो जाता है तब तो जो बिना कारणके अपने-आप विनाश—सब पदार्थोंका अभाव माना गया है, उस अप्रतिसंख्यानिरोधकी मान्यतामें विरोध आवेगा तथा यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाला जगत् बिना पूर्ण ज्ञानके अपने-आप नष्ट हो जाता है, तब ज्ञान और उसके साधनका उपदेश व्यर्थ होगा। अतः उनका मत किसी प्रकार भी युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब आकाश कोई पदार्थ नहीं, किंतु आवरणका अभावमात्र है, इस मान्यताका खण्डन करते हैं— आकाशे चाविशेषात्॥ २। २। २४॥ आकाशे=आकाशके विषयमें; च=भी, उनकी मान्यता ठीक नहीं है; अविशेषात्=क्योंकि अन्य भाव-पदार्थोंसे उसमें कोई विशेषता नहीं है। व्याख्या—पृथिवी, जल आदि जितने भी भाव-पदार्थ देखे जाते हैं, उन्हींकी भाँति आकाश भी भावरूप है। आकाशकी भी सत्ताका सबको बोध