भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १३-१४] अध्याय २ २१३ साक्षात् परमेश्वर करता है या एक तत्त्व दूसरे तत्त्वको स्वयं उत्पन्न करता है? इसपर कहते हैं- तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ २।३।१३ ॥ तदभिध्यानात् = उन तत्त्वोंके भलीभाँति चिन्तन करनेका कथन होनेसे; एव=ही; तु=तो (यह सिद्ध होता है कि); सः = वह परमात्मा ही उन सबकी रचना करता है; तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसीके अनुरूप है। व्याख्या - इस प्रकरणमें बार-बार कार्यके चिन्तनकी बात कही गयी है, यह चिन्तनरूप कर्म जडमें सम्भव नहीं है, चेतन परमात्मामें ही संगत हो सकता है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वयं ही उत्पन्न किये हुए पहले तत्त्वसे दूसरे तत्त्वको उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्यसे एक तत्त्वसे दूसरे तत्त्वकी उत्पत्तिका कथन है। उन तत्त्वोंको स्वतन्त्ररूपसे एक-दूसरेके कार्य-कारण बतानेके उद्देश्यसे नहीं। इसलिये यही समझना चाहिये कि मुख्यरूपसे सबकी रचना करनेवाला वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इस प्रकार जगत्की उत्पत्तिके वर्णनद्वारा ब्रह्मको जगत्का कारण बताकर अब प्रलयके वर्णनसे भी इसी बातकी पुष्टि करते हैं- विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २।३।१४ ॥ तु=किंतु; अतः = इस उत्पत्ति-क्रमसे; क्रमः = प्रलयका क्रम; विपर्ययेण = विपरीत होता है; उपपद्यते = ऐसा ही होना युक्तिसंगत है; च=तथा (स्मृतिमें भी ऐसा ही वर्णन है)। व्याख्या - उपनिषदोंमें जगत्की उत्पत्तिका जो क्रम बताया गया है, इससे विपरीत क्रम प्रलयकालमें होता है। प्रारम्भिक सृष्टिके समय ब्रह्मसे आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति होती है। फिर जब प्रलयकाल आता है, तब ठीक उसके विपरीत क्रमसे पृथिवी आदि तत्त्वोंका अपने कारणोंमें लय होता है। जैसे पृथिवी जलमें, जल