वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २३ ] अध्याय २ २२१ व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' (३।१।९) अर्थात् 'यह अणु परिणामवाला आत्मा चित्तसे जाननेके योग्य है।' तथा श्वेताश्वतरमें कहा है कि 'बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः।' (५।९) अर्थात् 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े किये जायँ और उनमेंसे एक टुकड़ेके पुनः एक सौ टुकड़े किये जायँ, तो उतना ही माप जीवात्माका समझना चाहिये।' इस प्रकार श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोंमें जीवको 'अणु' कहा गया है तथा उपमासे भी उसका अणुके तुल्य माप बताया गया है एवं युक्तिसे भी यही समझमें आता है कि जीवात्मा अणु है; अन्यथा वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट कैसे हो सकता ? अतः यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा अणु है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके एक देशमें स्थित मान लेनेसे उसको समस्त शरीरमें होनेवाले सुख-दुःखादिका अनुभव कैसे होगा ? इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है— अविरोधश्चन्दनवत् ॥ २।३।२३॥ चन्दनवत्=जिस प्रकार एक देशमें लगाया हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही एक देशमें स्थित आत्मा विज्ञानरूप गुणद्वारा समस्त शरीरको व्याप्त करके सुख-दुःखादिका ज्ञाता हो जाता है, अतः;, अविरोधः=कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जीवको अणु मान लेनेपर उसको शरीरके प्रत्येक देशमें होनेवाली पीड़ाका ज्ञान होना युक्तिविरुद्ध प्रतीत होता है, ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार किसी एक देशमें लगाया हुआ या मकानमें किसी एक जगह रखा हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही शरीरके भीतर एक जगह हृदयमें स्थित हुआ जीवात्मा अपने विज्ञानरूप गुणके द्वारा समस्त शरीरमें फैल जाता है और सभी अंगोंमें होनेवाले सुख-दुःखोंको जान सकता है।