भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

सूत्र ४४-४५ ] अध्याय २ २४१ मन्त्रवर्णाच्च ॥ २ । ३ । ४४ ॥ मन्त्रवर्णात् = मन्त्रके शब्दोंसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—मन्त्रमें कहा है कि पहले जो कुछ वर्णन किया गया है उतना तो इस परब्रह्म परमेश्वरका महत्त्व है ही; वह परमपुरुष उससे अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है और इसके तीन पाद अमृतस्वरूप दिव्य (सर्वथा अलौकिक अपने ही विज्ञानानन्दस्वरूपमें) हैं,* (छा० उ० ३।१२।६)। इस प्रकार मन्त्रके शब्दोंमें स्पष्ट ही समस्त जीवोंको ईश्वरका अंश बताया गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। सम्बन्ध— उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ २ । ३ । ४५ ॥ अपि=इसके सिवा; स्मर्यते च=(भगवद्गीता आदिमें) यही स्मरण भी किया गया है। व्याख्या—यह बात केवल मन्त्रमें ही नहीं कही गयी है, अपितु गीता (१५।७)-में साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने भी इसका अनुमोदन किया है— ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।’ ‘इस जीवलोकमें यह जीवसमुदाय मेरा ही अंश है।’ इसी प्रकार दसवें अध्यायमें अपनी मुख्य- मुख्य विभूतियों अर्थात् अंशसमुदायका वर्णन करके अन्त (१०।४२)- में कहा है कि— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥ ‘अर्जुन! तुझे इस बहुत भेदोंको अलग-अलग जाननेसे क्या प्रयोजन है, तू बस इतना ही समझ ले कि मैं अपनी शक्तिके किसी एक अंशसे इस

  • यह मन्त्र पहले पृष्ठ ४० में आ गया है।