भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 486 में से

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आदिसे भी उनका भेद सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः शास्त्रमें जो परब्रह्म परमेश्वरके द्वारा ईक्षण (संकल्प)-पूर्वक जगत्की उत्पत्ति करनेका वर्णन है, उसकी भी संगति नहीं बैठेगी।

प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ २ । ३ । ५३ ॥

चेत् = यदि कहो; प्रदेशात् = उपाधियोंमें देशभेद होनेसे (सब व्यवस्था हो जायगी); इति न = तो यह नहीं हो सकता; अन्तर्भावात् = क्योंकि सभी देशोंका उपाधिमें और उपाधियोंका सब देशोंमें अन्तर्भाव है। व्याख्या—यदि कहो, उपाधियोंमें देशका भेद होनेसे सब जीवोंका अलग-अलग विभाग हो जायगा और उसीसे कर्मफल-भोग एवं संकल्प आदिकी भी व्यवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वर सभी उपाधियोंमें व्याप्त है। उपाधियोंके देशभेदसे परमात्माके देशमें भेद नहीं हो सकता। प्रत्येक उपाधिका सम्बन्ध सब देशोंसे हो सकता है। उपाधि एक जगहसे दूसरी जगह जाय तो उसके साथ आकाश नहीं आता-जाता है। जब जिस देशमें उपाधि रहती है, उस समय वहाँका आकाश उसमें आ जाता है। इस प्रकार समस्त आकाशके प्रदेशका सब उपाधियोंमें अन्तर्भाव होगा। इसी तरह समस्त उपाधियोंका भी आकाशमें अन्तर्भाव होगा। किसी प्रकारसे कोई विभाग सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसलिये परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्माओंका अंशांशिभाव घटाकाशकी भाँति उपाधिनिमित्तक नहीं माना जा सकता।*

तीसरा पाद सम्पूर्ण

  • इसका विस्तार सूत्र ३ । ३ । ३५ से ३ । ३ । ४१ की व्याख्यामें पढ़ना चाहिये।