वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'चरण' शब्दको बिना किसी कारणके कर्मसंस्कारका उपलक्षण मानना निरर्थक है, इसलिये उपर्युक्त उत्तर ठीक नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है, उपर्युक्त उत्तर सर्वथा उचित है, क्योंकि कर्मसंस्काररूप अनुशय पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणोंसे ही बनता है, अतः कर्माशयके लिये आचरण अपेक्षित है, इसलिये, 'चरण' शब्दका प्रयोग निरर्थक नहीं है। सम्बन्ध—अब पूर्वोक्त शंकाके उत्तरमें महर्षि बादरिका मत प्रस्तुत करते हैं— सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३ । १ । ११ ॥ बादरिः तु=बादरि आचार्य तो, इति=ऐसा (मानते हैं कि); सुकृत- दुष्कृते=इस प्रकरणमें 'चरण' नामसे शुभाशुभ कर्म; एव=ही कहे गये हैं। व्याख्या—आचार्य श्रीबादरिका कहना है कि यहाँ उपलक्षण माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है; यहाँ 'रमणीयचरण' शब्द पुण्यकर्मोंका और 'कपूयचरण' शब्द पापकर्मका ही वाचक है। अतः यह समझना चाहिये कि जो रमणीयचरण हैं, वे शुभ कर्माशयवाले हैं और जो कपूयचरण हैं वे पाप कर्माशयवाले हैं। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए ही लौटता है। सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षी पुनः शंका उपस्थित करता है— अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ ३ । १ । १२ ॥ च=किंतु; अनिष्टादिकारिणाम्=अशुभ आदि कर्म करनेवालोंका; अपि=भी (चन्द्रलोकमें जाना); श्रुतम्=वेदमें सुना गया है। व्याख्या—कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्में कहा है कि 'ये वैके चास्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति।' ( १।२) अर्थात् 'जो कोई भी इस लोकसे जाते हैं, वे सब चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार यहाँ कोई विशेषण न देकर सभीका चन्द्रलोकमें जाना कहा