वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ यहाँ चौथी स्वेदज अर्थात् पसीनेसे उत्पन्न होनेवाली श्रेणीको क्यों छोड़ा गया ? इसपर कहते हैं— तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ ३ । १ । २१ ॥ संशोकजस्य = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जीवसमुदायका; तृतीयशब्दा- वरोधः = तीसरे नामवाली उद्भिज्ज-जातिमें संग्रह (समझना चाहिये)। व्याख्या—इस प्रकरणमें जो पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले स्वेदज जीवोंका वर्णन नहीं हुआ, उसका श्रुतिमें तीसरे नामसे कही हुई उद्भिज्ज-जातिमें अन्तर्भाव समझना चाहिये; क्योंकि दोनों ही पृथिवी और जलके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। सम्बन्ध—अब स्वर्गलोकसे लौटनेकी गतिपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । ५, ६)- में कहा गया है कि स्वर्गसे लौटनेवाले जीव पहले आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाशसे वायु, धूम, मेघ आदिके क्रमसे उत्पन्न होते हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव उन-उन आकाश आदिके रूपमें स्वयं परिणत होते हैं या उनके समान हो जाते हैं? इसपर कहते हैं— तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ ३ । १ । २२ ॥ तत्साभाव्यापत्तिः = उनके सदृश भावकी प्राप्ति होती है; उपपत्तेः = क्योंकि यही बात युक्तिसे सिद्ध होती है। व्याख्या—यहाँ जो आकाश, वायु आदि बनकर लौटनेकी बात कही गयी है, इस कथनसे जीवात्माका उन-उन तत्त्वोंके रूपमें परिणत होना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि आकाश आदि पहलेसे विद्यमान हैं और जीवात्मा जब एकके बाद दूसरे भावको प्राप्त हो जाते हैं उसके बाद भी वे आकाशादि पदार्थ रहते ही हैं। इसलिये यही मानना युक्तिसंगत है कि वे उन आकाश आदिके सदृश आकारवाले बनकर लौटते हैं। उनका आकाशके सदृश सूक्ष्म हो जाना ही आकाशको प्राप्त होना है। इसी प्रकार वायु आदिके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।