वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ २९५ सम्बन्ध—अब दूसरे दृष्टान्तसे उसी बातको सिद्ध करते हैं— प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३ । २ । १५ ॥ च=तथा; प्रकाशवत्=प्रकाशकी भाँति; अवैयर्थ्यात्=दोनोंमेंसे कोई भी लक्षण या उसके प्रतिपादक वेदवाक्य व्यर्थ नहीं हैं, इसलिये (यही सिद्ध होता है कि परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला है)। व्याख्या—जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदि सभी ज्योतियोंके दो रूप होते हैं—एक प्रकट और दूसरा अप्रकट—उन दोनोंमेंसे कोई भी व्यर्थ नहीं है, दोनों ही सार्थक हैं, उसी प्रकार उस ब्रह्मके भी दोनों रूप सार्थक हैं, व्यर्थ नहीं हैं; क्योंकि ऐसा माननेसे ही उसकी उपासना आदिकी सार्थकता होगी, दोनोंमेंसे किसी एकको प्रधान और दूसरेको गौण या अनावश्यक मान लेंगे तो उसकी सार्थकता नहीं होगी। श्रुतिमें उसके दोनों लक्षणोंका वर्णन है, श्रुतिके वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वतःप्रमाण हैं, अतः उन वेदवाक्योंकी सार्थकताके लिये भी ब्रह्मको सविशेष और निर्विशेष दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त मानना ही उचित है। सम्बन्ध—अब श्रुतिमें प्रतीत होनेवाले विरोधका दो सूत्रोंद्वारा समाधान किया जाता है— आह च तन्मात्रम् ॥ ३ । २ । १६ ॥ तन्मात्रम्=(श्रुति उस परमात्माको) केवल सत्य, ज्ञान और अनन्तमात्र; च=ही; आह=बताती है, वहाँ सगुणवाचक शब्दोंका प्रयोग नहीं है। व्याख्या—तैत्तिरीय-श्रुतिमें ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ (तै० उ० २।१) अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है’—इस प्रकार ब्रह्मको केवल ज्ञानस्वरूप ही बताया है, सत्यसंकल्पत्व आदि गुणोंवाला नहीं बताया, अतः उसको दोनों लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—ऐसी बात नहीं है; किंतु—