वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २२ ] अध्याय ३ ३०१ और तेज—इन तीनोंको उनके कार्यसहित, मूर्त बताया है तथा वायु और आकाशको अमूर्त कहा है। उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत्में प्राण और हृदयाकाशको अमूर्त तथा उससे भिन्न शरीर और इन्द्रियगोलकादिको मूर्त बताया है। उनमेंसे जिनको मूर्त बताया, उनको नाशवान् अर्थात् उस रूपमें न रहनेवाले, किंतु प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेके कारण 'सत्' कहा, उसी प्रकार अमूर्तको अमृत अर्थात् नष्ट न होनेवाला बतलाया। इस प्रकार उन जड तत्त्वोंका विवेचन करते समय ही आधिभौतिक जगत्में सूर्यमण्डलको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रको मूर्तका सार बताया है। इसी प्रकार आधिदैविक जगत्में सूर्यमण्डलस्थ पुरुषको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रस्थ पुरुषको अमूर्तका सार कहा है। इस तरह सगुण परमेश्वरके साकार और निराकार— इन दो रूपोंका वर्णन करके फिर कहा गया है कि 'नेति-नेति' अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं। इससे बढ़कर कोई उपदेश नहीं है। तदनन्तर यह बताया गया है 'उस परम तत्त्वका नाम सत्यका सत्य है, यह प्राण अर्थात् जीवात्मा सत्य है और उसका भी सत्य वह परब्रह्म परमेश्वर है।' (बृह० उ० २। ३। १—६) इस प्रकार उस परमेश्वरके साकार रूपका वर्णन करके यह भाव दिखाया गया है कि इनमें जो जड अंश है, वह तो उसकी अपरा प्रकृतिका विस्तार है और जो चेतन है, वह जीवात्मारूप उसकी परा प्रकृति है और इन दोनों सत्योंका आश्रयभूत वह परब्रह्म परमेश्वर इनसे भी पर अर्थात् श्रेष्ठ है। अतः यहाँ 'नेति-नेति' श्रुति सगुण परमात्माका प्रतिषेध करनेके लिये नहीं है; किंतु इसकी इयत्ता अर्थात् वह इतना ही है, इस परिमित भावका निषेध करके उस परमेश्वरकी असीमता—अनन्तता सिद्ध करनेके लिये है। इसीलिये 'नेति-नेति' कहकर सत्यके सत्य परमेश्वरका होना सिद्ध किया गया है। अतः यह परब्रह्म परमेश्वर केवल निर्गुण-निर्विशेष ही है, सगुण नहीं; ऐसी बात नहीं समझनी चाहिये। सम्बन्ध—उस परब्रह्म परमात्माके सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूप वास्तवमें प्राकृत मन-बुद्धि और इन्द्रियोंसे अतीत हैं, इस भावको स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं—