भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 486 में से

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पृष्ठ 312

सूत्र ३२ ] अध्याय ३ ३०९ अब यह जिज्ञासा होती है कि इन दोनोंमेंसे अभेदपक्ष उत्तम है या भेदपक्ष ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— सामान्यात् ॥ ३ । २ । ३२ ॥ सामान्यात्=श्रुतिमें भेद-वर्णन और अभेद-वर्णन दोनों समानभावसे हैं इससे, तु=तो (यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं)। व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको सबका ईश्वर१, अधिपति२, प्रेरक३, शासक४ और अन्तर्यामी५ बतानेवाली भेदप्रतिपादक श्रुतियाँ जिस प्रकार प्रमाण-भूत हैं, उसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ (छा० उ० ६।८ वेंसे १६ वें खण्डतक)—‘वह ब्रह्म तू है,’ ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृह० उ० २।५।१९)— ‘यह आत्मा ब्रह्म है।’ इत्यादि अभेदप्रतिपादक श्रुतियाँ भी प्रमाण हैं। दोनोंकी प्रामाणिकतामें किंचिन्मात्र भी अन्तर नहीं है। इसलिये किसी एक पक्षको श्रेष्ठ और दूसरेको इसके विपरीत बताना कदापि सम्भव नहीं है। अतः भेद और अभेद दोनों ही पक्ष मान्य हैं। सम्बन्ध— श्रुतिमें कहीं तो उस ब्रह्मको अपनेसे भिन्न मानकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा है; यथा—‘तंँह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥’ (श्वेता० उ० ६।१८)—‘परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले उन प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छावाला उपासक शरण लेता हूँ।’ इस मन्त्रके अनुसार उपासक अपनेसे भिन्न उपास्यदेवकी शरण ग्रहण करता है। इससे भेदोपासना सिद्ध होती है और कहीं १. ‘एष सर्वेश्वरः’। (मा० उ० ६) २. ‘एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः। (बृह० उ० ४।४।२२) ३. ‘भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा’। (श्वेता० उ० १।१२) ४. ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः।’ (बृह० उ० ३।८।९) ५. ‘एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥’ (बृह० उ० ३।७।३)