भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 486 में से

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पृष्ठ 314

सूत्र ३४-३५ ] अध्याय ३ ३११ स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ॥ ३।२।३४॥ प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदिकी भाँति; स्थानविशेषात् = शरीररूप स्थानकी विशेषताके कारण (उनमें नानात्व आदि भेदका होना विरुद्ध नहीं है)। व्याख्या—जिस प्रकार सभी प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जातिकी दृष्टिसे एक हैं; किंतु दीपक, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदिमें स्थान और शक्तिका भेद होनेके कारण इन सबमें परस्पर भेद एवं नानात्व है ही; उसी प्रकार भगवान्‌की पराप्रकृतिके नाते सब जीवसमुदाय अभिन्न हैं तथापि जीवोंके अनादि कर्म-संस्कारोंका जो समूह है, उसके अनुसार फलरूपमें प्राप्त हुए शरीर, बुद्धि एवं शक्ति आदिके तारतम्यसे उनमें परस्पर भेद होना असंगत नहीं है। सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये कहते हैं— उपपत्तेश्च ॥ ३।२।३५ ॥ उपपत्तेः = श्रुतिकी संगतिसे; च = भी (यह बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—श्रुतिमें जगत्‌की उत्पत्तिसे पहले एकमात्र अद्वितीय परमात्माकी ही सत्ता बतायी गयी है। फिर उसीसे सबकी उत्पत्तिका वर्णन करके उसे सबका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया है। उसके बाद 'तत्त्वमसि' (वह ब्रह्म तू है) इत्यादि वचनोंद्वारा उस परमात्माको अपनेसे अभिन्न मानकर उसकी उपासना करनेके लिये उपदेश दिया गया है। फिर उसीको भोक्ता, भोग्य आदिसे युक्त इस विचित्र जड-चेतनात्मक जगत्‌का स्रष्टा, संचालक तथा जीवोंके कर्मफलभोग एवं बन्ध-मोक्षकी व्यवस्था करनेवाला कहा गया है। जीवसमुदाय तथा उनके कर्म-संस्कारोंको अनादि बताकर उनकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है। इन सब प्रसंगोंपर विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि जीवसमुदाय चैतन्य-जातिके कारण तो परस्पर एक या अभिन्न हैं; परंतु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित सीमित व्यक्तित्वके कारण भिन्न-भिन्न हैं। प्रलयकालमें सब जीव ब्रह्ममें विलीन होते हैं, सृष्टिके समय