वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ
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सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३१५ पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् ॥ ३ । २ । ४१ ॥ तु=परंतु; बादरायणः=वेदव्यासः; पूर्वम्=पूर्वोक्त परमेश्वरको ही कर्मफलदाता मानते हैं; हेतुव्यपदेशात्=क्योंकि वेदमें उसीको सबका कारण बताया गया है (इसलिये जैमिनिका कथन ठीक नहीं है)। व्याख्या—सूत्रकार व्यासजी कहते हैं कि जैमिनि जो कर्मको ही फल देनेवाला कहते हैं वह ठीक नहीं; कर्म तो निमित्तमात्र होता है, वह जड, परिवर्तनशील और क्षणिक होनेके कारण फलकी व्यवस्था नहीं कर सकता; अतः जैसा कि पहले कहा गया है; वह परमेश्वर ही जीवोंके कर्मानुसार फल देनेवाला है; क्योंकि श्रुतिमें ईश्वरको ही सबका हेतु बताया गया है। दूसरा पाद सम्पूर्ण