वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८-९ ] अध्याय १ २९ हेयत्वावचनाच्च ॥ १।१।८॥ हेयत्वावचनात्=त्यागनेयोग्य नहीं बताये जानेके कारण; च=भी (उस प्रसंगमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है)। व्याख्या—यदि 'आत्मा' शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका उपदेश दिया जाता; किंतु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगत्का कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है; अतः परब्रह्म परमात्मा ही 'आत्म' शब्दका वाच्य है और वही इस जगत्का निमित्त एवं उपादान कारण है। सम्बन्ध— 'आत्मा' की ही भाँति इस प्रसंगमें 'सत्' शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है' यह सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— स्वाप्ययात् ॥ १।१।९॥ स्वाप्ययात्=अपनेमें विलीन होना बताया गया है, इसलिये (सत्- शब्द भी जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१)-में कहा है कि 'यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनँ स्वपितीत्याचक्षते' अर्थात् 'हे सोम्य! जिस अवस्थामें यह पुरुष (जीवात्मा) सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण)- से सम्पन्न (संयुक्त) होता है; स्व—अपनेमें अपीत—विलीन होता है, इसलिये इसे 'स्वपिति' कहते हैं।'* इस प्रसंगमें जिस सत्को समस्त जगत्का कारण बताया है, उसीमें जीवात्माका विलीन होना कहा गया है और उस सत्को उसका स्वरूप
- यहाँ स्व (अपने)-में विलीन होना कहा गया है; अतः यह संदेह हो सकता है कि 'स्व' शब्द जीवात्माका ही वाचक है, इसलिये वही जगत्का कारण है, परंतु ऐसा समझना