वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही होंगे, अन्यथा उसका ब्रह्मलोकमें गमन कैसे सम्भव होगा? क्योंकि ऊपरके लोकोंमें जाना शुभ कर्मोंका ही फल है।' इसपर कहते हैं— साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ ३ । ३ । २७ ॥ साम्पराये = ज्ञानीके लिये परलोकमें; तर्तव्याभावात् = भोगके द्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता; इस कारण (उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं); हि = क्योंकि; तथा = यही बात; अन्ये = अन्य शाखावाले कहते हैं। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्में यह बात स्पष्ट शब्दोंमें बतायी गयी है कि ‘उभे उ हैवैष एते तरति।’ (४।४।२२) अर्थात् ‘यह ज्ञानी निश्चय ही पुण्य और पाप दोनोंको यहीं पार कर जाता है।’ इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी पुरुषका शरीर त्याग देनेके बाद शुभाशुभ कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसे जो ब्रह्मलोक (नित्य धाम) प्राप्त होता है, वह किसी कर्मके फलरूपमें नहीं, अपितु ब्रह्मज्ञानके बलसे प्राप्त होता है। अतः उसके लिये परलोकमें जाकर भोगद्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता, इसलिये उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं। ज्ञानीके संचित आदि समस्त कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है, इस बातका समर्थन मुण्डकोपनिषद्में भी इस प्रकार किया गया है—‘तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति ॥’ (मु० उ० ३।१।३)—‘उस समय ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनोंको हटाकर निर्मल हो सर्वोत्तम साम्यरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।’ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि ‘समस्त कर्मोंका नाश और ब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल तो ब्रह्मज्ञानसे यहीं तत्काल प्राप्त हो जाता है। फिर देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त करनेकी बात क्यों कही गयी है?’ इसपर कहते हैं— छन्दत उभयथाविरोधात् ॥ ३ । ३ । २८ ॥ छन्दतः = ज्ञानी पुरुषके संकल्पके अनुसार; उभयथा = दोनों प्रकारकी