वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करते हैं— उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥ ३ । ३ । ३० ॥ तल्लक्षणार्थोपलब्धेः=उस देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेके उपयुक्त सूक्ष्म शरीरादि उपकरणोंकी प्राप्तिका कथन होनेसे; उपपन्नः=उनके लिये ब्रह्मलोकमें जानेका कथन युक्तिसंगत है; लोकवत्=लोकमें भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ साधकके लिये देवयानमार्गके द्वारा ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही है, उस प्रकरणमें उसके उपयोगी उपकरणोंका वर्णन भी पाया जाता है। श्रुतिमें कहा है कि यह जीवात्मा जिस संकल्पवाला होता है, उस संकल्पद्वारा मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदान वायुमें स्थित हो मन-इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उसके संकल्पानुसार लोकमें ले जाता है। (प्र० उ० ३।१०) इसी तरह दूसरी जगह अर्चि- अभिमानी देवतादिको प्राप्त होना कहा है। (छा० उ० ५।१०।१, २) इस प्रकार समस्त कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जानेपर भी उसका दिव्य- शरीरसे सम्पन्न होना बतलाया गया है; किंतु जिन साधकोंको शरीर रहते हुए परब्रह्म परमेश्वर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उनके लिये वैसा वर्णन नहीं आता* (क० उ० २।३।१४); अपितु उनके विषयमें श्रुतिने इस प्रकार कहा है कि—‘योऽकामो निष्काम आप्तकाम आप्तकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति॥’ (बृह० उ० ४।४।६) अर्थात् ‘जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम तथा केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते। वह ब्रह्म होकर ही (यहीं) ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।’ इसलिये यही मानना सुसंगत है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। लोकमें भी देखा जाता है कि जिसको अपने स्थानसे कहीं अन्यत्र जाना
- यह मन्त्र-सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें दे दिया गया है।