भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 486 में से

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पृष्ठ 353

३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकारके धर्मोंवाला है।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व आदि जितने भी परमेश्वरके दिव्य गुण हैं, वे उनमें स्वाभाविक हैं, उपाधिकृत नहीं हैं। अतः जहाँ जिन लक्षणोंका वर्णन नहीं है, वहाँ उनका अध्याहार कर लेना चाहिये; इस प्रकार परमात्मा और जीवात्मामें समानधर्मता न होनेके कारण उनमें सर्वथा अभेद नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा, तब तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी। इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा जो यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी व्यवस्था कैसे होगी? इसपर कहते हैं— आदरादलोपः ॥ ३। ३। ४० ॥ आदरात् = वह कथन परमेश्वरके प्रति आदरका प्रदर्शक होनेके कारण; अलोपः = उसमें अन्य द्रष्टाका लोप अर्थात् निषेध नहीं है। व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरको सर्वश्रेष्ठ बतलानेके लिये वहाँ आदरकी दृष्टिसे अन्य द्रष्टाका निषेध किया गया है, वास्तवमें नहीं। भाव यह है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ऐसा द्रष्टा, ऐसा सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता है कि उसकी अपेक्षा अन्य सब जीव द्रष्टा होते हुए भी नहींके समान हैं; क्योंकि उनमें पूर्ण द्रष्टापन नहीं है। प्रलयकालमें जड तत्त्वोंकी भाँति जीवोंको भी किसी प्रकारका विशेष ज्ञान नहीं रहता तथा वर्तमानकालमें भी जो जीवोंका जानना, देखना, सुनना आदि है, वह सीमित है और उस अन्तर्यामी परमेश्वरके ही सकाशासे है। (ऐ० उ० १। ३। ११) तथा (प्र० उ० ४। ९) वही इसका प्रेरक है, अतः यह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिका वह कहना भगवान्‌की श्रेष्ठता दिखलानेके लिये है, वास्तवमें अन्य द्रष्टाका निषेध करनेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथन परमेश्वरके प्रति आदर सूचित करनेके लिये है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं—