वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या - वेदान्त-शास्त्रमें जहाँ-जहाँ ब्रह्मज्ञानके फलका वर्णन किया गया है, वहाँ इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे सदाके लिये छूटकर उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जानारूप फलका ही अधिकतासे वर्णन मिलता है, इसलिये वही प्रबल अर्थात् प्रधान फल है, ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि उसके साथ-साथ जो किसी-किसी प्रकरणमें ब्रह्मलोकके भोगोंकी प्राप्तिरूप दूसरे फलका वर्णन आता है, वह भी मुख्य फलकी प्रधानता सिद्ध करनेके लिये ही है। इसीलिये उसका सब प्रकरणोंमें वर्णन नहीं किया गया है; किंतु उपर्युक्त मुख्य फलका वर्णन तो सभी प्रकरणोंमें आता है। सम्बन्ध - ब्रह्मज्ञान ही इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे छूटनेका निश्चित उपाय है, यह बात सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है- पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् ॥ ३।३।४५ ॥ क्रियामानसवत् = शारीरिक और मानसिक क्रियाओंमें स्वीकृत विकल्पकी भाँति; पूर्वविकल्पः = पहले कही हुई अग्निविद्या भी विकल्पसे मुक्तिकी हेतु; स्यात् = हो सकती है; प्रकरणात् = यह बात प्रकरणसे सिद्ध होती है। व्याख्या - नचिकेताके प्रश्न और यमराजके उत्तरविषयक प्रकरणकी आलोचना करनेसे यही सिद्ध होता है कि जिस प्रकार उपासनासम्बन्धी शारीरिक क्रियाकी भाँति मानसिक क्रिया भी फल देनेमें समर्थ है, अतः अधिकारिभेदसे जो फल शारीरिक क्रिया करनेवालेको मिलता है, वही मानसिक क्रिया करनेवालेको भी मिल जाता है; उसी प्रकार अग्निहोत्ररूप कर्म भी ब्रह्मविद्याकी ही भाँति मुक्तिका हेतु हो सकता है। उक्त प्रकरणमें नचिकेताने प्रश्न करते समय यमराजसे यह बात कही है कि 'स्वर्गलोकमें किंचिन्मात्र भय नहीं है, वहाँ न तो आपका डर है और न बुढ़ापेका ही, भूख और प्यास - इनसे पार होकर यह जीव शोकसे रहित हुआ स्वर्गमें प्रसन्न होता है, उस स्वर्गके देनेवाले अग्निहोत्ररूप कर्मके रहस्यको आप जानते हैं, वह मुझे बताइये' इत्यादि (क० उ० १।१।१२-१३)। इसपर यमराजने वह