वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
भिन्न-भिन्न होनेके कारण उपासनाके प्रकारमें और उसके फलमें आंशिक भेद होना स्वाभाविक है। अभिप्राय यह कि सभी साधक एक ही प्रकारका भाव लेकर ब्रह्मप्राप्तिके साधनोंमें नहीं लगते, प्रत्येक साधककी भावनामें भेद रहता है। कोई साधक तो ऐसा होता है जो स्वभावसे ही समस्त भोगोंको दुःखप्रद और परिवर्तनशील समझकर उनसे विरक्त हो जाता है तथा परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कार होनेमें थोड़ा भी विलम्ब उसके लिये असह्य होता है। कोई साधक ऐसा होता है जो बुद्धिके विचारसे तो भोगोंको दुःखरूप समझता है, इसीलिये साधनमें भी लगा है, परंतु ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाले भोग दुःखसे मिले हुए नहीं हैं, वहाँ केवल सुख-ही-सुख है तथा वहाँ जानेके बाद पुनरावृत्ति नहीं होती, सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्ति हो जाती है, इस भावनासे भावित है, परमात्माकी प्राप्ति तत्काल ही हो, ऐसी तीव्र लालसावाला नहीं है। इसी प्रकार साधकोंकी भावना अनेक प्रकारकी हो सकती है तथा उन भावनाओंके और योग्यताके भेदसे उनके अधिकारमें भी भेद होना स्वाभाविक है। इसलिये उन्हें बीचमें प्राप्त होनेवाले फलोंमें भेद होना सम्भव है। जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे सदाके लिये मुक्ति एवं परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्तिरूप जो चरम फल है, वह तो उन सबको यथासमय प्राप्त होता ही है। साधकके भावानुबन्धसे फलमें भेद होनेकी बात उन-उन प्रकरणोंमें स्पष्टरूपसे उपलब्ध होती है। जैसे इन्द्र और विरोचन ब्रह्माजीसे ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये गये। उनकी जो ब्रह्मविद्याके साधनमें प्रवृत्ति हुई उसमें मुख्य कारण यह था जो उन्होंने ब्रह्माजीके मुखसे यह सुना कि उस परमात्माको जान लेनेवाला समस्त लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त हो जाता है। इस फलश्रुतिपर ही उनका मुख्य लक्ष्य था, इसीलिये विरोचन तो उस विद्याका अधिकारी न होनेके कारण उसमें टिक ही नहीं सका; परंतु इन्द्रने उस विद्याको ग्रहण किया। फिर भी उसके मनमें प्रधानता उन लोकों और भोगोंकी ही थी, यह वहाँके प्रकरणमें स्पष्ट है (छा० उ० ८। ७। ३)। दहरविद्यामें भी उसी प्रकारसे ब्रह्मलोकके दिव्य भोगोंकी प्रशंसा है