वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध- जिस प्रकार वैश्वानरविद्यामें एक-एक अंगकी उपासनाका वर्णन आता है, उसी प्रकार और भी कई जगह आता है, ऐसी उपासनाओंमें उनके एक-एक अंगकी अलग-अलग उपासना करनी चाहिये या सब अंगोंका समुच्चय करके एक साथ सबकी उपासना करनी चाहिये। इस जिज्ञासापर कहते हैं- भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥ ३।३।५७॥ क्रतुवत्=अंग-उपांगसे परिपूर्ण यज्ञकी भाँति; भूम्नः = पूर्ण उपासनाकी; ज्यायस्त्वम् = श्रेष्ठता है; हि = क्योंकि; तथा = वैसा ही कथन; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है। व्याख्या-जिस प्रकार यज्ञके किसी अंशका अनुष्ठान करना और किसीका न करना श्रेष्ठ नहीं है, किंतु सर्वांगपूर्ण अनुष्ठान ही श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वैश्वानरविद्या आदिमें बतायी हुई उपासनाका अनुष्ठान भी पूर्णरूपसे करना ही श्रेष्ठ है; उसके एक अंगका नहीं। वैश्वानरविद्याकी भाँति सभी जगह यह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि श्रुतिने वैसा ही भाव वैश्वानर- विद्याके वर्णनमें दिखाया है। राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छहों ऋषियोंसे अलग-अलग पूछा कि 'तुम वैश्वानरकी किस प्रकार उपासना करते हो?' उन्होंने अपनी-अपनी बात कही। राजाने एक-एक करके सबको बताया- 'तुम अमुक अंगकी उपासना करते हो।' साथ ही उन्होंने उस एकांग उपासनाका साधारण फल बताया और उन सबको भय दिखाते हुए कहा, 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा सिर गिर जाता, तुम अंधे हो जाते'-इत्यादि (छा० उ० ५।११ से १७ तक)। तदनन्तर (अठारहवें खण्डमें) यह बताया कि 'तुमलोग उस वैश्वानर परमात्माके एक-एक अंगकी उपासना करते हो, जो इस बातको समझकर आत्मरूपसे इसकी उपासना करता है, वह समस्त लोकमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करनेवाला हो जाता है।' (छा० उ० ५।१८।१) इस प्रकार वहाँ पूर्ण