वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १६ ] अध्याय ३ ३७९ परमेश्वर ही लोक अर्थात् निवासस्थान है।' (बृह० उ० ४।४।२२) इत्यादि श्रुतियोंमें कितने ही विद्वानोंका स्वेच्छापूर्वक गृहस्थ-आश्रम और कर्मोंका त्याग करना बतलाया गया है। यदि 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि श्रुति सभी विद्वानोंके लिये कर्मका विधान करनेवाली मान ली जाय तो इस श्रुतिसे विरोध आयेगा। अतः यही समझना चाहिये कि विद्वानोंमें कोई अपनी पूर्वप्रकृतिके अनुसार आजीवन कर्म करता रहता है और कोई छोड़ देता है, इसमें उनकी स्वतन्त्रता है। इसलिये भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अंग है। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं- उपमर्दं च ॥ ३।४।१६ ॥ च=इसके सिवा; उपमर्दम्= ब्रह्मविद्यासे कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाना कहा है (इससे भी पूर्वोक्त बात सिद्ध होती है)। व्याख्या- 'उस परमात्माका ज्ञान हो जानेपर इसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं' (मु० उ० २।२।८) इत्यादि श्रुतियोंमें तथा स्मृतिमें भी ज्ञानका फल समस्त कर्मोंका भलीभाँति नाश बतलाया है (गीता ४।३७) * इसलिये ब्रह्मविद्याको कर्मका अंग नहीं माना जा सकता; तथा केवल ब्रह्मविद्यासे परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती, यह कहना भी नहीं बन सकता। सम्बन्ध - यहाँतक जैमिनिद्वारा उपस्थित की हुई सब शंकाओंका उत्तर देकर यह सिद्ध किया कि 'विद्या कर्मका अंग नहीं है, स्वतन्त्र साधन है।' अब उसी बातकी पुनः पुष्टि करते हैं-
- यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥ 'हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित आग लकड़ियोंको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।'