भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

सूत्र ३२-३३ ] अध्याय ३ ३९३ विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३।४।३२॥ च=तथा; विहितत्वात्=शास्त्रविहित होनेके कारण; आश्रमकर्म=आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंका; अपि=भी (अनुष्ठान करना चाहिये)। व्याख्या—ज्ञानीके द्वारा भी जिस प्रकार शरीर स्थितिके लिये उपयोगी भोजनादि कर्म तथा ब्रह्मविद्योपयोगी शम-दमादि कर्म लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य हैं, उसी प्रकार जिस आश्रममें वह रहता हो, उस आश्रमके कर्म भी उसके लिये विहित हैं (बृह० उ० ४।४।२२)।* अतः उनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; इसीलिये भगवान्ने भी कहा है— ‘हे अर्जुन! जैसे अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें आसक्त होकर उनका अनुष्ठान करता है वैसे ही ज्ञानी भी लोकसंग्रहको चाहता हुआ बिना आसक्तिके उनका अनुष्ठान करे। (गीता ३।२५) सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं— सहकारित्वेन च॥ ३।४।३३॥ सहकारित्वेन=साधनमें सहायक होनेके कारण; च=भी (उनका अनुष्ठान लोकसंग्रहके लिये करना चाहिये)। व्याख्या—जिस प्रकार शम, दम, तितिक्षादि कर्म परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें सहायक हैं, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित आश्रमसम्बन्धी आचार, व्यवहार आदि भी सहायक हैं। इसलिये उनका अनुष्ठान भी लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये, त्याग नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ब्रह्मविद्याका अभ्यास करनेवाले साधकोंके लिये निष्कामभावसे और परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रम-सम्बन्धी विहित कर्मोंका अनुष्ठान तथा खान- पानसम्बन्धी सदाचारका पालन आवश्यक है। अब परब्रह्म पुरुषोत्तमकी

  • तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन।