भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 486 में से

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पृष्ठ 403

४०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्थान और वेदाध्ययन आदि सब कुछ कर लिये।' (श्रीमद्भा० ३।३३।७) इसी प्रकार जगह-जगह भगवान्‌के भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए वर्ण- आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेवालोंकी अपेक्षा उनकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध- इस प्रकार उपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि विशेष धर्मोंका महत्त्व दिखलाया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश आश्रमका व्यतिक्रम करना चाहे तो कर सकता है या नहीं? यदि कर ले तो उसका व्यक्तित्व कैसा माना जाना चाहिये? इत्यादि। अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- तद्भूतस्य नातद्भावो जैमिनेरपि नियमात्- द्रूपाभावेभ्यः ॥ ३।४।४०॥ तद्भूतस्य = उच्च आश्रममें स्थित मनुष्यका; [तु =] तो; अतद्भावः = उसे छोड़कर पूर्व आश्रममें लौट आना; न=नहीं बन सकता; नियमात्- द्रूपाभावेभ्यः = क्योंकि शास्त्रोंमें पीछे न लौटनेका ही नियम है, श्रुतिमें आश्रम बदलनेका जो क्रम कहा गया है, उससे यह विपरीत है और इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है; जैमिनेः अपि = जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है। व्याख्या - जो चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर चुके हैं, उनका पुनः गृहस्थाश्रममें लौटना शास्त्रसम्मत नहीं है। इसी प्रकार वानप्रस्थका भी पुनः गृहस्थमें प्रवेश उचित नहीं है; क्योंकि ऊँचे आश्रमोंमें जाकर पुनः लौटनेका श्रुति-स्मृतियोंमें निषेध है तथा आश्रम बदलनेका जो क्रम श्रुतिमें बताया गया है, वह इस प्रकार है- 'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।'-'ब्रह्मचर्यको पूरा करके गृहस्थ होवे, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो और वानप्रस्थसे संन्यास ले अथवा दूसरे प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे या गृहस्थसे