वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५ ] अध्याय ४ ४१३ उपासकका अन्तरात्मा नहीं है। प्रत्युत प्रतीकमें जिसकी उपासना की जाती है वह साधकका आत्मा है। जैसे मूर्ति आदिमें भगवान्की भावना करके उपासना की जाती है, उसी प्रकार मन आदि प्रतीकमें भी उपासना करनेका विधान है। भाव यह है कि पूर्वोक्त मन, आकाश, आदित्य आदिको प्रतीक बनाकर उनमें भगवान्के उद्देश्यसे की हुई जो उपासना है, उसे परम दयालु पुरुषोत्तम परमात्मा अपनी ही उपासना मानकर ग्रहण करते हैं और उपासकको उसकी भावनाके अनुसार फल भी देते हैं; इसीलिये वैसी उपासनाका भी विधान किया गया है, परंतु प्रतीकको अपना अन्तर्यामी आत्मा नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—प्रतिकोपासना करनेवालेको प्रतीकमें ब्रह्मभाव करना चाहिये या ब्रह्ममें उस प्रतीकका भाव करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ४ । १ । ५ ॥ उत्कर्षात् = ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये; ब्रह्मदृष्टिः = प्रतीकमें ब्रह्मदृष्टि करनी चाहिये (क्योंकि निकृष्ट वस्तुमें ही उत्कृष्टकी भावना की जाती है)। व्याख्या—जब किसी देवताकी प्रत्यक्ष उपासना करनेका साधन सुलभ नहीं हो, तब सुविधापूर्वक उपलब्ध हुई साधारण वस्तुमें उस देवताकी भावना करके उपासना की जाती है, देवतामें उस वस्तुकी भावना नहीं की जाती है; क्योंकि वैसा करनेका कोई उपयोग ही नहीं है। उसी प्रकार जो साधक उस परब्रह्म परमात्माके तत्त्वको नहीं समझ सकता, उसके लिये प्रतीकोपासनाका विधान किया गया है, अतः उसे चाहिये कि इन्द्रिय आदिसे प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले प्राण, मन, सूर्य, चन्द्रमा आदि किसी भी पदार्थको उस परब्रह्म परमात्माका प्रतीक बनाकर उसमें ब्रह्मकी भावना करके उपासना करे, क्योंकि परब्रह्म परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ है और निकृष्टमें ही श्रेष्ठकी भावना की जाती हैं, श्रेष्ठमें निकृष्टकी नहीं। इस प्रकार प्रतीकमें ब्रह्मभाव करके उपासना करनेसे वह परब्रह्म परमात्मा उस उपासनाको अपनी ही उपासना मानते हैं।