भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

सूत्र २३ ] अध्याय १ ३९ भूत (पंचतत्त्व और समस्त प्राणी) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशमें ही विलीन होते हैं। आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है। वही इन सबका परम आधार है।' इसमें आकाशके लिये जो विशेषण आये हैं वे भूताकाशमें सम्भव नहीं हैं; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमें आ जाता है। अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसंगत नहीं है। उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामें ही संगत हो सकते हैं। वही सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमें 'आकाश' नामसे परमेश्वरको ही जगत्का कारण बताया गया है। सम्बन्ध — अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ० १ । ११ । ५)-में आकाशकी ही भाँति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है; वहाँ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इसपर कहते हैं— अत एव प्राणः ॥ १। १। २३॥ अत एव = इसीलिये अर्थात् श्रुतिमें कहे हुए लक्षण ब्रह्ममें ही सम्भव हैं, इस कारण वहाँ; प्राणः = प्राण (भी ब्रह्म ही हैं)। व्याख्या — छान्दोग्य० (१।११।५)-में कहा है कि 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते।' अर्थात् 'निश्चय ही ये सब भूत प्राणमें ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं।' ये लक्षण प्राणवायुमें नहीं घट सकते; क्योंकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण प्राणवायु नहीं हो सकता। अतः यहाँ 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये। सम्बन्ध — पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है; किंतु छान्दोग्योपनिषद् (३।१३। ७)-में जिस ज्योति (तेज)-को समस्त विश्वसे ऊपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया है तथा जिसकी शरीरान्तर्वर्ती पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ