वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३-४ ] अध्याय ४ ४२५ अत एव=इसीसे; च=यह भी (समझ लेना चाहिये कि); अनु=उनके साथ-साथ; सर्वाणि=समस्त इन्द्रियाँ (मनमें स्थित हो जाती हैं)। व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में कहा है कि—'तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भव- मिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥' 'अर्थात् जिसके शरीरकी गरमी शान्त हो चुकी है, ऐसा जीवात्मा मनमें स्थित हुई इन्द्रियोंके सहित पुनर्जन्मको प्राप्त होता है।' (प्र० उ० ३।९) इस प्रकार श्रुतिमें किसी एक इन्द्रियका मनमें स्थित होना न कहकर समस्त इन्द्रियोंकी मनमें स्थिति बतायी गयी है तथा सभी इन्द्रियोंके कर्मोंका बंद होना प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः पूर्वोक्त दोनों प्रमाणोंसे ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ अन्य इन्द्रियाँ भी मनमें स्थित हो जाती हैं। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तन्मनः प्राण उत्तरात्॥ ४। २। ३॥ उत्तरात्=उसके बादके कथनसे (यह स्पष्ट है कि); तत्=वह (इन्द्रियोंके सहित); मनः=मन; प्राणे=प्राणमें (स्थित हो जाता है)। व्याख्या—पूर्वोक्त श्रुतिमें जो दूसरा वाक्य है, 'मनः प्राणे' (छा० उ० ६। ८। ६) उससे यह भी स्पष्ट है कि वह मन इन्द्रियोंके साथ ही प्राणमें स्थित हो जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः॥ ४। २। ४॥ तदुपगमादिभ्यः=उस जीवात्माके गमन आदिके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि; सः=वह प्राण, मन और इन्द्रियोंके साथ; अध्यक्षे=अपने स्वामी जीवात्मामें (स्थित हो जाता है)। व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि 'उस समय यह आत्मा नेत्रसे या ब्रह्मरन्ध्रसे अथवा शरीरके अन्य किसी मार्गद्वारा शरीरसे बाहर निकलता है, उसके निकलनेपर उसीके साथ प्राण भी निकलता है और