भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १९ ] अध्याय ४ ४३७ किसी ज्ञानीका देहपात रात्रिके समय हो तो उसका क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वा- दर्शयति च॥ ४।२।१९॥ चेत्=यदि कहो कि; निशि=रात्रिमें; न=सूर्यकी रश्मियोंसे नाडीद्वारा उसका सम्बन्ध नहीं होता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं; (हि)=क्योंकि; सम्बन्धस्य=नाडी और सूर्य-रश्मियोंके सम्बन्धकी; यावद्देहभावित्वात्=जब- तक शरीर रहता है; तबतक सत्ता बनी रहती है, इसलिये (दिन हो या रात, कभी भी नाडी और सूर्य-रश्मियोंका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता); दर्शयति च=यही बात श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या—यदि कोई ऐसा कहे कि रात्रिमें देहपात होनेपर नाड़ियोंसे सूर्य-किरणोंका सम्बन्ध नहीं होगा, इसलिये उस समय मृत्युको प्राप्त हुआ विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे गमन नहीं कर सकता, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें कहा है कि—'इस सूर्यकी ये रश्मियाँ इस लोकमें और उस सूर्यलोकमें—दोनों जगह गमन करती हैं, वे सूर्यमण्डलसे निकलती हुई शरीरकी नाडियोंमें व्याप्त हो रही हैं तथा नाडियोंसे निकलती हुई सूर्यमें फैली हुई हैं।'* (छा० उ० ८।६।२) इसलिये श्रुतिके इस कथनानुसार जबतक शरीर रहता है, तबतक हर जगह और हर समय सूर्यकी रश्मियाँ उसकी नाडियोंमें व्याप्त रहती हैं; अतः किसी समय भी देहपात होनेपर सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्माका नाड़ियोंके द्वारा तत्काल सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध होता है और वह विद्वान् सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। सम्बन्ध—क्या दक्षिणायनकालमें मरनेपर भी विद्वान् ब्रह्मलोकमें चला जाता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

  • एता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥