वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २ ] अध्याय ४ ४४१ उस मार्गका प्रसिद्ध नाम अर्चिः आदि है, क्योंकि वह अर्चिसे प्रारम्भ होनेवाला मार्ग है। इसके द्वारा ही ब्रह्मलोकमें जानेवाले सब साधक जाते हैं। इसीका देवयान, उत्तरायणमार्ग आदि नामोंसे वर्णन आया है। तथा मार्गमें आनेवाले लोकोंका जो वर्णन आता है, वह कहीं कम है, कहीं अधिक है। उन स्थलोंमें जहाँ जिस लोकका वर्णन नहीं किया गया है, वहाँ उसका अन्यत्रके वर्णनसे अध्याहार कर लेना चाहिये। सम्बन्ध — एक जगह कहे हुए लोकोंका दूसरी जगह किस प्रकार अध्याहार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ ४ । ३ । २ ॥ वायुम् = वायुलोकको; अब्दात् = संवत्सरके बाद (और सूर्यके पहले समझना चाहिये); अविशेषविशेषाभ्याम् = क्योंकि कहीं वायुका वर्णन समानभावसे है और कहीं विशेषभावसे है। व्याख्या — एक श्रुति कहती है 'जो इस प्रकार ब्रह्मविद्याके रहस्यको जानते हैं तथा जो वनमें रहकर श्रद्धापूर्वक सत्यकी उपासना करते हैं, वे अर्चि (ज्योति, अग्नि अथवा सूर्यकिरण) -को प्राप्त होते हैं, अर्चिसे दिनको, दिनसे शुक्लपक्षको, शुक्लपक्षसे उत्तरायणके छः महीनोंको, छः महीनोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे सूर्यको, सूर्यसे चन्द्रमाको तथा चन्द्रमासे विद्युत्को। वहाँसे अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, यह देवयानमार्ग है' (छा० उ० ५ । १० । १-२)। दूसरी श्रुतिका कथन है— 'जब यह मनुष्य इस लोकसे ब्रह्मलोकको जाता है, तब वह वायुको प्राप्त होता है, वायु उसके लिये रथ-चक्रके छिद्रकी भाँति रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे वह ऊपर चढ़ता है, फिर वह सूर्यको प्राप्त होता है, वहाँ उसे सूर्य लम्बर नामके वाद्यमें रहनेवाले छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह चन्द्रमाको प्राप्त होता है, चन्द्रमा उसके लिये नगारेके छिद्रके सदृश रास्ता दे देता