वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ७-८ ] अध्याय ४ ४४५ जाता है; यहाँ पहले बादरि आचार्यकी ओरसे सातवें सूत्रसे ग्यारहवें सूत्रतक उसके पक्षकी स्थापना की जाती है— कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ४ । ३ । ७ ॥ बादरिः=आचार्य बादरिका मत है कि; कार्यम्=कार्यब्रह्मको अर्थात् हिरण्यगर्भको (प्राप्त होते हैं); गत्युपपत्तेः=क्योंकि गमन करनेके कथनकी उपपत्ति; अस्य=इस कार्यब्रह्मके लिये ही (हो सकती है)। व्याख्या—श्रुतिमें जो लोकान्तरमें गमनका कथन है, वह परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये उचित नहीं है; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा तो सभी जगह हैं, उनको पानेके लिये लोकान्तरमें जानेकी क्या आवश्यकता है? अतः यही सिद्ध होता है कि इन ब्रह्मविद्याओंकी उपासना करनेवालोंके लिये जो प्राप्त होनेवाला ब्रह्म है, वह परब्रह्म नहीं; किंतु कार्यब्रह्म ही है; क्योंकि इस कार्यब्रह्मकी प्राप्तिके लिये लोकान्तरमें जाकर उसे प्राप्त करनेका कथन सर्वथा युक्तिसंगत है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे अपने पक्षको दृढ़ करते हैं— विशेषितत्वाच्च ॥ ४ । ३ । ८ ॥ च=तथा; विशेषितत्वात्=विशेषण देकर स्पष्ट कहा गया है; इसलिये भी (कार्यब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित है)। व्याख्या—'अमानव पुरुष इनको ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है' (बृह० उ० ६ । २ । १५) इस श्रुतिमें ब्रह्मलोकमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा ब्रह्मलोकोंमें ले जानेकी बात कही गयी है, ब्रह्मको प्राप्त होनेकी बात नहीं कही गयी, इस प्रकार विशेषरूपसे स्पष्ट कहा जानेके कारण भी यही सिद्ध होता है कि कार्य ब्रह्मको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह लोकोंका स्वामी है; अतः भोग्यभूमि अनेक होनेके कारण लोकोंके साथ बहुवचनका प्रयोग उचित ही है।