भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 486 में से

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४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

सम्बन्ध-इस प्रकरणमें 'गायत्री' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १। १। २६ ॥ भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः = (यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेसे ही) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इसलिये; च = भी; एवम् = ऐसा ही है। व्याख्या-छान्दोग्य० (३।१२)-के प्रकरणमें गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पादोंसे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए 'पुरुष' नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोंको (अर्थात् प्राणि-समुदायको) उसका एक पाद बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोंको परमधाममें स्थित कहा गया है (छा० उ० ३।१२।६)*। इस वर्णनकी संगति तभी लग सकती है, जब कि 'गायत्री' शब्दको गायत्रीछन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय। इसलिये यही मानना ठीक है। सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं- उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १। १। २७ ॥ चेत् = यदि कहो; उपदेशभेदात् = उपदेशमें भिन्नता होनेसे; न = गायत्री- शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न = तो यह कथन ठीक नहीं है; उभयस्मिन् अपि अविरोधात् = क्योंकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी (वास्तवमें) कोई विरोध नहीं है। व्याख्या-यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र (३।१२।६)-में तो 'तीन पाद दिव्यलोकमें हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोंका आधार बताया गया है और बादमें आये हुए मन्त्र (३।१३।७)-में 'ज्योतिः'

  • सूत्र १।१।२४ की टिप्पणीमें यह मन्त्र आ गया है।