वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ११-१२ ] अध्याय ४ ४४७ व्याख्या—'जिन्होंने उपनिषदोंके विज्ञानद्वारा उनके अर्थभूत परमात्माका भलीभाँति निश्चय कर लिया है तथा कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक ब्रह्मलोकोंमें जाकर अन्तकालमें परम अमृतस्वरूप होकर भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं।'१ (मु० उ० ३।२।६) इस प्रकार श्रुतिमें उन सबकी मुक्तिका कथन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रलयकालमें ब्रह्मलोकका नाश होनेपर उसके स्वामी ब्रह्माके सहित वहाँ गये हुए ब्रह्मविद्याके उपासक भी परब्रह्मको प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं, इसलिये उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे अपने पक्षको पुष्ट करते हैं— स्मृतेश्च ॥ ४।३।११॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—'वे सब शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष प्रलयकाल प्राप्त होनेपर समस्त जगत्के अन्तमें ब्रह्माके साथ उस परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं।'२ (कू० पु०, पूर्व ख० ११।२८४) इस प्रकार स्मृतिमें भी यही भाव प्रदर्शित किया है, इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—यहाँतक बादरिके पक्षकी स्थापना करके अब उसके उत्तरमें आचार्य जैमिनिका मत उद्धृत करते हैं— परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ ४।३।१२॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनिका कहना है कि; मुख्यत्वात्=ब्रह्मशब्दका मुख्य वाच्यार्थ होनेके कारण; परम्=परब्रह्मको प्राप्त होता है (यही मानना युक्तिसंगत है)। १-यह मन्त्र पृष्ठ ३६० में अर्थसहित आ गया है। २-ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥