भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १३-१४ ] अध्याय ४ ४५९ है। जैसे द्वादशाह-यज्ञ श्रुतिमें कहीं अनेककर्तृक होनेपर ‘सत्र’ और नियतकर्तृक होनेपर ‘अहीन’ माना गया है, उसी तरह यहाँ भी श्रुतिमें दोनों प्रकारका कथन होनेसे मुक्तात्माका स्थूल शरीरसे युक्त होकर दिव्य भोगोंका भोगना और बिना शरीरके केवल मनसे ही उनका उपभोग करना भी सम्भव है। उसकी यह दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है, इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—बिना शरीरके केवल मनसे उपभोग कैसे होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तन्वभावे संध्यवदुपपत्तेः ॥ ४।४।१३ ॥ तन्वभावे = शरीरके अभावमें; संध्यवत् = स्वप्नकी भाँति (भोगोंका उपभोग होता है); उपपत्तेः = क्योंकि यही मानना युक्तिसंगत है। व्याख्या—जैसे स्वप्नमें स्थूल शरीरके बिना मनसे ही समस्त भोगोंका उपभोग होता देखा जाता है, वैसे ही ब्रह्मलोकमें भी बिना शरीरके समस्त दिव्य भोगोंका उपभोग होना सम्भव है; इसलिये बादरिकी यह मान्यता सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—शरीरके द्वारा किस प्रकार उपभोग होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भावे जाग्रद्वत् ॥ ४।४।१४॥ भावे=शरीर होनेपर; जाग्रद्वत्=जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति (उपभोग होना युक्तिसंगत है)। व्याख्या—आचार्य जैमिनिके मतानुसार जिस मुक्तात्माको शरीरकी उपलब्धि होती है, वह उसके द्वारा उसी प्रकार भोगोंका उपभोग करता है, जैसे यहाँ जाग्रत्-अवस्थामें साधारण मनुष्य विषयोंका अनुभव करता है। ब्रह्मलोकमें ऐसा होना भी सम्भव है; इसलिये दोनों प्रकारकी स्थिति माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—जैमिनिने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके अनुसार मुक्तात्माके