भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

सूत्र १९-२०] अध्याय ४ ४६३ सम्बन्ध - यदि इस प्रकार उन-उन लोकोंके विकारमय भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही वे सब शरीर, शक्ति और अधिकार आदि उसे मिले हैं, तब तो देवलोकोंको प्राप्त होनेवाले कर्माधिकारियोंके सदृश ही ब्रह्मविद्याका भी फल हुआ, इसमें विशेषता क्या हुई ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह ॥४।४।१९॥ च = इसके सिवा; विकारावर्ति = वह मुक्तात्मा जन्मादि विकारोंसे रहित ब्रह्मरूप फलका अनुभव करता है; हि= क्योंकि; तथा=उसकी वैसी; स्थितिम् = स्थिति; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या - श्रुतिमें ब्रह्मविद्याका मुख्य फल परब्रह्मकी प्राप्ति बताया गया है, 'जो जन्म, जरा आदि विकारोंको न प्राप्त होनेवाला, अजर-अमर, समस्त पापोंसे रहित तथा कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है।' (छा० उ० ८।१।५) इसलिये यही सिद्ध होता है कि उसको प्राप्त होनेवाला फल कर्मफलकी भाँति विकारी नहीं है। ब्रह्मलोकके भोग तो आनुषंगिक फल हैं। ब्रह्मविद्याकी सार्थकता तो परब्रह्मकी प्राप्ति करानेमें ही है। श्रुतिमें उस मुक्तात्माकी ऐसी ही स्थिति बतायी गयी है- 'यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति ॥' (तै० उ० २।७) अर्थात् 'जब यह जीवात्मा इस देखनेमें न आनेवाले, शरीररहित बतलानेमें न आनेवाले तथा दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें निर्भयतापूर्वक स्थिति लाभ करता है, तब वह निर्भय पदको प्राप्त हो जाता है।' सम्बन्ध - पहले कहे हुए सिद्धान्तको ही प्रमाणसे दृढ़ करते हैं- दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ ४।४।२०॥ प्रत्यक्षानुमाने = श्रुति और स्मृति; च=भी; एवम् = इसी प्रकार; दर्शयतः = दिखलाती हैं। व्याख्या - श्रुतिमें स्पष्ट कहा है कि 'वह परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने