भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

सूत्र २२ ] अध्याय ४ ४६५ यही सिद्ध होता है कि जगत्की रचना आदि कार्यमें उसका ब्रह्माके समान किसी भी अंशमें अधिकार या सामर्थ्य नहीं है। सम्बन्ध — यदि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्त आत्माकी सामर्थ्य सीमित है, परमात्माके समान असीम नहीं है, तब तो उसके उपभोगका समय पूर्ण होनेपर उसका पुनर्जन्म भी हो सकता है? इसपर कहते हैं— अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४ । ४ । २२ ॥ अनावृत्तिः = ब्रह्मलोकमें गये हुए आत्माका पुनरागमन नहीं होता; शब्दात् = यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है; अनावृत्तिः = पुनरागमन नहीं होता; शब्दात् = यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतिमें बार-बार यह बात कही गयी है कि ब्रह्मलोकमें गया हुआ साधक वापस नहीं लौटता (बृह० उ० ६।२।१५; प्र० उ० १।१०; छा० उ० ८।६।६; ४।१५।६; ८।१५।१)। इस शब्द-प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाला अधिकारी वहाँसे इस लोकमें नहीं लौटता। 'अनावृत्तिः शब्दात्' इस वाक्यकी आवृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का चौथा अध्याय पूरा हुआ। ॥ वेदान्त-दर्शन सम्पूर्ण ॥