भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 486 में से

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पृष्ठ 76

सूत्र ३० ] अध्याय १ ७३ फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोंको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनुष्य आदिके रूपमें भी समय-समयपर प्रकट होते हैं। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोंसे भी प्रमाणित है। इस कारण विराट्‌रूपमें उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बन्धित माननेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि वह सर्वसमर्थ भगवान् देश-कालातीत और देश-कालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है। यह बात माण्डूक्योपनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके चार पादोंका वर्णन करके भलीभाँति समझायी गयी है। सम्बन्ध — अब इस विषयमें बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १।२।३०॥ अनुस्मृतेः = विराट्‌रूपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमें; (अविरोधः = ) कोई विरोध नहीं है; (इति = ) ऐसा; बादरिः = बादरि नामक आचार्य मानते हैं। व्याख्या — परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत हैं तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान और स्मरण करनेके लिये उन्हें देश-विशेषमें स्थित विराट्स्वरूप मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि भगवान् सर्वसमर्थ हैं। उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते हैं, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी-उसी रूपमें उनको मिलते हैं। *

  • श्रीमद्भागवतमें भी ऐसा ही कहा गया है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (३।९।११) 'महान् यशस्वी परमेश्वर ! आपके भक्तजन अपने हृदयमें आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते हैं, आप उन संत-महानुभावोंपर अनुग्रह करनेके लिये वही- वही शरीर धारण कर लेते हैं।'