वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १३ ] अध्याय १ ८५ व्याख्या - उक्त प्रसंगमें आगे चलकर कहा गया है— 'वह अक्षर देखनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबको देखनेवाला है; सुननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सुननेवाला है; मनन करनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।११) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमें देखने, सुनने और जाननेमें आनेवाले प्रधान आदिके धर्मोंका निराकरण किया गया है,* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता। अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर' नामसे परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त प्रकरणमें 'अक्षर' शब्दको परब्रह्मका वाचक सिद्ध किया गया; किंतु प्रश्नोपनिषद् (५। २-७)-में ॐकार अक्षरको परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनोंका प्रतीक बताया गया है अतः वहाँ अक्षरको अपरब्रह्म भी माना जा सकता है, इस शंकाकी निवृत्तिके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १ । ३ । १३ ॥ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परमपुरुषको 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बताये जानेके कारण; सः = वह परब्रह्म परमेश्वर ही (त्रिमात्रासम्पन्न 'ओम्' इस अक्षरके द्वारा चिन्तन करनेयोग्य बताया गया है)। व्याख्या - इस सूत्रमें जिस मन्त्रपर विचार चल रहा है, वह इस प्रकार है— 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते।' (प्र० उ० ५। ५) अर्थात् 'जो तीन मात्राओंवाले 'ओम्' रूप इस अक्षरके द्वारा ही इस परम पुरुषका निरन्तर
- उपर्युक्त श्रुतिमें अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमें प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका भी निराकरण किया गया है।