भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 486 में से

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त्रुटियोंको सूचित करें, जिससे दूसरे संस्करणमें उनके सुधारका प्रयत्न किया जा सके। यहाँ प्रसंगवश ब्रह्मसूत्र और उसके प्रतिपाद्य विषयके सम्बन्धमें भी कुछ निवेदन करना आवश्यक प्रतीत होता है। ब्रह्मसूत्र अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है। कुछ आधुनिक विद्वान् इसमें सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन, पाशुपत और पांचरात्र आदि मतोंकी आलोचना देखकर इसे अर्वाचीन बतानेका साहस करते हैं और बादरायणको वेदव्याससे भिन्न मानते हैं; परंतु उनकी यह धारणा नितान्त भ्रमपूर्ण है। ब्रह्मसूत्रमें जिन मतोंकी आलोचना की गयी है, वे प्रवाहरूपसे अनादि हैं। वैदिककालसे ही सद्वाद और असद्वाद (आस्तिक और नास्तिकमत)-का विवाद चला आ रहा है। इन प्रवाहरूपसे चले आते हुए विचारोंमेंसे किसी एकको अपनाकर भिन्न-भिन्न दर्शनोंका संकलन हुआ है। सूत्रकारने कहीं भी अपने सूत्रमें सांख्य, जैन, बौद्ध या वैशेषिक मतके आचार्योंका नामोल्लेख नहीं किया है। उन्होंने केवल प्रधानकारणवाद, अणुकारणवाद, विज्ञानवाद आदि सिद्धान्तोंकी ही समीक्षा की है। सूत्रोंमें बादरि, औडुलोमि, जैमिनि, आश्मरथ्य, काशकृत्स्न और आत्रेय आदिके नाम आये हैं, जो अत्यन्त प्राचीन हैं; इनमेंसे कितनोंके नाम मीमांसासूत्रोंमें भी उल्लिखित हैं। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी 'हेतुमद्' विशेषणसहित 'ब्रह्मसूत्र' का नाम आता है, इससे भी इसकी परम प्राचीनता सिद्ध होती है। बादरायण शब्द पुराणकालसे ही श्रीवेदव्यासजीके लिये व्यवहृत होता आया है। अतः ब्रह्मसूत्र वेदव्यासजीकी ही रचना है, यह माननेमें कोई बाधा नहीं है। पाणिनिने पाराशर्य व्यासद्वारा रचित 'भिक्षुसूत्र' की भी चर्चा अपने सूत्रोंमें की है। वह अब उपलब्ध नहीं है। अथवा यह भी सम्भव है, वह ब्रह्मसूत्रसे अभिन्न रहा हो। सूत्रकारने अपने ग्रन्थको चार अध्यायों और सोलह पादोंमें विभक्त किया है। पहले अध्यायमें बताया गया है कि सभी वेदान्तवाक्योंका एकमात्र परब्रह्मके प्रतिपादनमें ही अन्वय है; इसलिये उसका नाम 'समन्वयाध्याय' है। दूसरे अध्यायमें सब प्रकारके विरोधाभासोंका निराकरण किया गया है, इसलिये उसका नाम 'अविरोधाध्याय' है। तीसरेमें परब्रह्मकी प्राप्ति या साक्षात्कारके साधनभूत ब्रह्मविद्या तथा दूसरी-दूसरी उपासनाओंके विषयमें निर्णय किया गया है, अतः उसको 'साधनाध्याय' कहते हैं और चौथेमें उन विद्याओंद्वारा साधकोंके