वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १। ३। १६ ॥ धृतेः = इस 'दहर'में समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्ति बतायी जानेके कारण; च = भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है क्योंकि) अस्य = इसकी; महिम्नः = (समस्त लोकोंको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका; अस्मिन् = इस परब्रह्म परमात्मामें होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमें भी पाया जाता है, इसलिये ('दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है)। व्याख्या—छान्दोग्य० (८। ४। १)-में कहा गया है कि 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम्।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन सब लोकोंको धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य आत्मामें समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण 'दहर' यहाँ परमात्माका ही वाचक है; क्योंकि दूसरी श्रुतियोंमें भी परमेश्वरमें ऐसी महिमा होनेका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' (बृह० उ० ३। ८। ९) अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर परमात्माके ही शासनमें रहकर सूर्य और चन्द्रमा भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हैं' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय।' (बृ० उ० ४। ४। २२) अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है। यह सब भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है। सम्बन्ध—अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं— प्रसिद्धेश्च ॥ १। ३। १७ ॥ प्रसिद्धेः = आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है, इस कारण; च = भी ('दहर' नाम परब्रह्मका ही है)।