वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २७ ] अध्याय १ ९५ देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी (अधिकार है); सम्भवात्=क्योंकि उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना सम्भव है। व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोंमें तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उनके द्वारा परमात्मज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है; इसलिये उनका अधिकार न बतलाना तो उचित ही है। परंतु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है। जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है। अतः उनमें पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है। अतएव साधन करनेपर उन्हें ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है। इसलिये भगवान् बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमें भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेका अधिकार है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही सूत्रकार स्वयं शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ १। ३। २७॥ चेत्=यदि कहो (देवता आदिको शरीरधारी मान लेनेसे); कर्मणि= यज्ञादि कर्ममें; विरोधः=विरोध आता है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; अनेकप्रतिपत्तेः=क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय अनेक रूप धारण करना सम्भव है; दर्शनात्=शास्त्रमें ऐसा देखा गया है। व्याख्या—'यदि देवता आदिको भी मनुष्योंके समान विशेष आकृतियुक्त या शरीरधारी मान लिया जायगा तो वे एक देशमें ही रहनेवाले माने जा सकते हैं। ऐसी दशामें एक ही समय अनेक यज्ञोंमें उनके निमित्त दी जानेवाली हविष्यकी आहुतिको वे कैसे ग्रहण कर सकते हैं? अतः पृथक्-पृथक् अनेक याज्ञिकोंद्वारा एक समय यज्ञादि कर्ममें जो उनके लिये हवि समर्पित करनेका विधान है, उसमें विरोध आयेगा। इस विरोधकी निवृत्ति तभी हो सकती है, जब देवताओंको एकदेशीय न मानकर व्यापक माना जाय।' परंतु ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि देवोंमें अनेक विग्रह धारण करनेकी सहज शक्ति