भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 810 में से

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ब्रह्मखण्ड

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परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण

नारदजीने पूछा— जगन्नाथ! जगद्गुरो! आपकी कृपासे मैंने सब कुछ सुन लिया। अब आप ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन—ब्रह्मतत्त्वका निरूपण कीजिये। प्रभो! सर्वेश्वर! ब्रह्म साकार है या निराकार? क्या उसका कुछ विशेषण भी है? अथवा वह विशेषणोंसे रहित (निर्विशेष) ही है? ब्रह्मका नेत्रोंसे दर्शन हो सकता है या नहीं? वह समस्त देहधारियोंमें लिप्त है अथवा नहीं? उसका क्या लक्षण बताया गया है? वेदमें उसका किस प्रकार निरूपण किया गया है? क्या प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त है या ब्रह्मस्वरूपिणी ही है? श्रुतिमें प्रकृतिका सारभूत लक्षण किस प्रकार सुना गया है? ब्रह्म और प्रकृति इन दोनोंमेंसे किसकी सृष्टिमें प्रधानता है? दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? सर्वज्ञ! इन सब बातोंपर मनसे विचार करके जो सिद्धान्त हो, उसे अवश्य मुझे बताइये।

नारदजीकी यह बात सुनकर भगवान् पञ्चमुख महादेव ठठाकर हँस पड़े और उन्होंने परब्रह्म-तत्त्वका निरूपण आरम्भ किया।

महादेवजी बोले— वत्स नारद! तुमने जो-जो पूछा है, वह उत्तम गूढ़ ज्ञानका विषय है। वेदों और पुराणोंमें भी वह उत्तम एवं गूढ़ ज्ञान परम दुर्लभ है। ब्रह्मन्! मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शेषनाग, धर्म और महाविराट्—इन सबने तथा श्रुतियोंने भी सब बातोंका निरूपण किया है। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारद! जो सविशेष तथा प्रत्यक्ष दृश्य-तत्त्व है, उसका हमलोगोंने वेदमें निरूपण किया है। प्राचीनकालकी बात है, वैकुण्ठधाममें मैंने, ब्रह्माजीने और धर्मने श्रीहरिके समक्ष अपना प्रश्न उपस्थित किया था। उस समय श्रीहरिने उसका जो कुछ उत्तर दिया, वह सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ। वह ज्ञान तत्त्वोंका सारभूत तत्त्व है, अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके लिये नेत्ररूप है तथा दुविधा अथवा द्वैत नामक भ्रमरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये सर्वोत्तम प्रदीपके समान है। सनातन परब्रह्म परमात्मस्वरूप है। वह देहधारियोंके कर्मोंके साक्षीरूपसे समस्त शरीरोंमें विराजमान है। प्रत्येक शरीरमें पाँचों प्राणोंके रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु विद्यमान हैं। मनके रूपमें प्रजापति ब्रह्मा विराज रहे हैं। सम्पूर्ण ज्ञान (बुद्धि)-के रूपमें स्वयं मैं हूँ और शक्तिके रूपमें ईश्वरीय प्रकृति है। हम सब-के-सब परमात्माके अधीन हैं। शरीरमें उसके स्थित होनेपर ही स्थित होते हैं और उसके चले जाने (सम्बन्ध हटा लेने)-पर हम भी चले जाते हैं। जैसे राजाके सेवक सदा राजाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार हम-लोग उस परमात्माके अनुगामी बने रहते हैं। जीव परमात्माका प्रतिबिम्ब है। वही कर्मोंके फलका उपभोग करता है। जैसे जलसे भरे हुए घड़ोंमें पृथक्-पृथक् सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब होता है तथा उन घड़ोंके फूट जानेपर वह प्रतिबिम्ब फिर चन्द्रमा और सूर्यमें लीन हो जाता है, उसी प्रकार सृष्टिकालमें परमात्माके प्रतिबिम्ब-स्वरूप जीवकी उपलब्धि होती है तथा सृष्टिमयी उपाधिके नष्ट हो जानेपर वह प्रतिबिम्बस्वरूप जीव पुनः सर्वव्यापी परमात्मामें लीन हो जाता है।

वत्स! संसारका संहार हो जानेपर एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। हम तथा यह चराचर जगत् उसीमें लीन हो जाते हैं। वह ब्रह्म मण्डलाकार ज्योतिःपुञ्जस्वरूप है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रकट होनेवाले कोटि-कोटि सूर्योंके समान उसका प्रकाश है। वह आकाशके समान विस्तृत, सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। योगीजनॉको ही वह चन्द्रमण्डलके समान सुखपूर्वक दिखायी देता है। योगीलोग उसे सनातन परब्रह्म कहते हैं और दिन-रात उस सर्वमङ्गलमय सत्यस्वरूप परमात्माका ध्यान करते रहते हैं। वह परमात्मा निरीह, निराकार तथा सबका ईश्वर है।

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