भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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१०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कलासे ही संसारकी सारी स्त्रियाँ प्रकट हुई हैं। प्रकृति ही माया है, जिसने सबको मोहमें डाल रखा है। वह सनातनी परमा प्रकृति नारायणी कही गयी है; क्योंकि वह परमपुरुष नारायणकी शक्ति है। सर्वात्मा ईश्वर भी उसीके द्वारा शक्तिमान् होते हैं। उस शक्तिके बिना वे सृष्टि करनेमें सदा असमर्थ ही हैं। वत्स! तुम इस समय जाकर विवाह करो। मैं तुम्हें पिताके आदेशका पालन करनेकी आज्ञा देता हूँ। जो गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला है, वह सदा सर्वत्र पूजनीय तथा विजयी होता है। जो पुरुष वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे अपनी पत्नीका सत्कार करता है, उसपर प्रकृतिदेवी संतुष्ट होती हैं। ठीक उसी तरह जैसे ब्राह्मणकी पूजा-अर्चा करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण संतुष्ट होते हैं। प्रकृति ही सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी मायासे स्त्रियोंके रूपमें प्रकट हुई हैं। अतः महिलाओंके अपमानसे वे प्रकृतिदेवी ही अपमानित होती हैं। जिसने पति-पुत्रसे युक्त सती-साध्वी दिव्य नारीका पूजन किया है, उसके द्वारा सर्वमङ्गलदायिनी प्रकृतिदेवीका ही पूजन सम्पन्न हुआ है। मूल प्रकृति एक ही है। वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी है। उसीको सनातनी विष्णुमाया कहा गया है। सृष्टिकालमें वह पाँच रूपोंमें प्रकट होती है। जो परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी है तथा समस्त प्रकृतियोंमें उन्हें सबसे अधिक प्यारी है, उस मुख्या प्रकृतिका नाम 'राधा' है। दूसरी प्रकृति नारायणप्रिया लक्ष्मी हैं, जो सर्वसम्पत्स्वरूपिणी हैं। तीसरी प्रकृति वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती हैं, जो सदा सबके द्वारा पूजनीया हैं। चौथी प्रकृति वेदमाता सावित्री हैं। वे ब्रह्माजीकी प्यारी पत्नी और सबकी पूजनीया हैं। पाँचवीं प्रकृतिका नाम दुर्गा है, जो भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी हैं। उन्हींके पुत्र गणेश हैं। (अध्याय ३०)


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