भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

( ११ ) विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या देना तथा उनकी कृपासे गोलोकधामको जाना, श्रीकृष्णकी मायासे निर्मित उनकी छायामयी स्त्रियोंका ब्राह्मणोंके घरोंमें जाना तथा विप्रपत्नियोंके पूर्वजन्मका परिचय...... ५०९ १७- श्रीकृष्णका कालियदहमें प्रवेश, नागराजका उनपर आक्रमण, श्रीकृष्णद्वारा उसका दमन, नागपत्नी सुरसाद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णकी उसपर कृपा, सुरसाका गोलोक- गमन, छायामयी सुरसाकी सृष्टि, कालियको वरदान, कालियद्वारा भगवान्‌की स्तुति, उस स्तुतिकी महिमा, नागका रमणक द्वीपको प्रस्थान, कालियका यमुनाजलमें निवासका कारण, गरुड़का भय, सौभरिके शापसे कालियदहतक जानेमें गरुड़की असमर्थता, श्रीकृष्णके कालियदहमें प्रवेश करनेसे ग्वालबालों तथा नन्द आदिकी व्याकुलता, बलरामका समझाना, श्रीकृष्णके निकल आनेसे सबको प्रसन्नता, दावानलसे व्रज- वासियोंकी रक्षा तथा नन्दभवनमें उत्सव ... ५१४ १८- मोहवश श्रीहरिके प्रभावको जाननेके लिये ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, बछड़ों और बालकोंका अपहरण, श्रीकृष्णद्वारा उन सबकी नूतन सृष्टि, ब्रह्माजीका श्रीहरिके पास आना, सबको श्रीकृष्णमय देख उनकी स्तुति करके पहलेके गौओं आदिको वापस देकर अपने लोकको जाना तथा श्रीकृष्णका घरको पधारना ............. ५२४ १९- नन्दद्वारा इन्द्रयागकी तैयारी, श्रीकृष्णद्वारा इसके विषयमें जिज्ञासा, नन्दजीका उत्तर और श्रीकृष्णद्वारा प्रतिवाद, श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रका यजन न करके गोपोंद्वारा ब्राह्मणों और गिरिराजका पूजन, उत्सवकी समाप्तिपर इन्द्रका कोप, नन्दद्वारा इन्द्रकी स्तुति, श्रीकृष्णका नन्दको इन्द्रकी स्तुतिसे रोककर सब व्रजवासियोंको गौओंसहित गोवर्धनकी गुफामें स्थापित करके पर्वतको छातेके डंडेकी भाँति उठा लेना; इन्द्र, देवताओं तथा मेघोंका स्तम्भन कर देना, पराजित इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका उन्हें विदा करके पर्वतको स्थापित कर देना तथा नन्दद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन ..................... ५२७ २०- ग्वालबालोंका श्रीकृष्णकी आज्ञासे तालवनके फल तोड़ना, धेनुकासुरका आक्रमण, श्रीकृष्णके स्पर्शसे उसे पूर्वजन्मकी स्मृति और उसके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, वैष्णवी मायासे पुनः उसे स्वरूपकी विस्मृति, फिर श्रीहरिके साथ उसका युद्ध और वध, बालकोंद्वारा सानन्द फल-भक्षण तथा सबका घरको प्रस्थान ................................................. ५३७ २१- धेनुकके पूर्वजन्मका परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमाका स्वच्छन्द विहार, दुर्वासाका शाप और वर, साहसिकका गदहेकी योनिमें जन्म लेना तथा तिलोत्तमाका बाणपुत्री 'उषा' होना ........................... ५४१ २२- दुर्वासाका और्वकन्या कन्दलीसे विवाह, उसकी कटूक्तियोंसे कुपित हो मुनिका उसे भस्म कर देना, फिर शोकसे देह-त्यागके लिये उद्यत मुनिको विप्ररूपधारी श्रीहरिका समझाना, उन्हें एकानंशाको पत्नी बनानेके लिये कहना, कन्दलीका भविष्य बताना और मुनिको ज्ञान देकर अन्तर्धान होना तथा मुनिकी तपस्यामें प्रवृत्ति ................. ५४३ २३- महर्षि और्वद्वारा दुर्वासाको शाप, दुर्वासाका अम्बरीषके यहाँ द्वादशीके दिन पारणाके समय पहुँचकर भोजन माँगना, वसिष्ठजीकी आज्ञासे अम्बरीषका पारणाकी पूर्तिके लिये भगवान्‌का चरणोदक पीना, दुर्वासाका राजाको मारनेके लिये कृत्या-पुरुष उत्पन्न करना, सुदर्शनचक्रका कृत्याको मारकर मुनिका पीछा करना, मुनिका कहीं भी आश्रय न पाकर वैकुण्ठमें जाना, वहाँसे भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार अम्बरीषके घर आकर भोजन करना तथा आशीर्वाद देकर अपने आश्रमको जाना .................................... ५४६ २४- एकादशीव्रतका माहात्म्य, इसे न करनेसे हानि, व्रतके सम्बन्धमें आवश्यक निर्णय, व्रतका विधान-छः देवताओंका पूजन, श्रीकृष्णका ध्यान और षोडशोपचार-पूजन तथा कर्ममें न्यूनताकी पूर्तिके लिये भगवान्‌से प्रार्थना .................................................. ५५२ २५- गोपकिशोरियोंद्वारा गौरी-व्रतका पालन, दुर्गा-स्तोत्र और उसकी महिमा, समाप्तिके दिन गोपियोंको नग्न-स्नान करती जान श्रीकृष्णद्वारा उनके वस्त्र आदिका अपहरण,